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निर्भया के साथ जिस बस में दरिंदगी हुई, उसकी जांच को लेकर भिड़ गई थीं ये तीन एजेंसियां

Fri, 20 Mar 2020 12:22 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 20 Mar 2020 12:22 PM IST
सार

  • ये तीन सवाल, जिनका जवाब सामने था, मगर उससे मानने को कोई तैयार नहीं हुआ
  • सामूहिक बलात्कार की घटना से जुड़ी चार्टर्ड बस का परमिट रद्द क्यों नहीं हुआ 
  • पिछले दो साल में इस बस का आठ बार चालान हुआ था 
  • इसमें से छह बार वह जब्त भी की गई थी बस
  • चालान होने के बाद ड्राइवर सीट पर हर बार बैठा गया नया चेहरा 

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Nirbhaya Case: three investigative agencies quarreled over the bus where crime was held
nirbhaya case - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

निर्भया के साथ जिस बस में दरिंदगी हुई थी, उस चार्टर्ड बस का 24 महीने में आठ बार चालान हुआ था। इसके बावजूद बस परमिट रद्द क्यों नहीं हुआ, इस मामले की जांच को तीन एजेंसियां आपस में भिड़ गई थीं। गृह मंत्रालय की एक विशेष कमेटी ने भी इस मामले की जांच की थी।
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सारे सबूत जांच एजेंसियों के सामने थे, मगर फिर भी किसी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। केवल ट्रैफिक पुलिस के कुछ अफसरों पर सवाल उठे। खास बात है कि ट्रैफिक पुलिस ने ही उस बस का आठ बार चालान किया था। बस को छह बार जब्त भी किया गया। जब भी उस बस को पकड़ा जाता, हर बार ड्राइविर सीट पर कोई नया चेहरा मिलता।

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अमूमन ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि बस चालान जैसे मामले की जांच में केंद्रीय गृह मंत्रालय खुद बीच में कूद पड़े। निर्भया के मामले में यही हुआ था। ट्रैफिक उल्लंघन के मामले में वह बस पकड़ी गई थी, मगर फिर भी दिल्ली की सड़कों पर सरपट दौड़ती रही।

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बस को जब्त करने का मुख्य कारण निर्धारित रूट और जगह से सवारी बैठाने के नियम का उल्लंघन करना रहा। सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद वह बस चर्चा में आई। किसी एजेंसी के पास यह जवाब नहीं था कि बस को जब्त करने के बावजूद इसका परमिट रद्द क्यों नहीं किया गया।

बस को लेकर किसने क्या कहा

सबसे लोकल पुलिस ने इस मामले की जांच पड़ताल की। फाइनल रिपोर्ट में कहा गया कि बस का मामला ट्रैफिक पुलिस के तहत आता है। यह अलग बात थी कि लोकल पुलिस भी बस संचालकों से मिलने वाली कथित घूस के हिस्से में शामिल थी। उन्होंने अपनी जांच में पूरी तरह से यह मामला ट्रैफिक पुलिस के सिर पर डाल दिया।

लोकल पुलिस ने इस बाबत अधिकार न होने की बात भी कह दी। यह कहा गया कि बस के परमिट को रद्द करने का अधिकार परिवहन विभाग के पास होता है। मामला ट्रैफिक पुलिस के पास पहुंचा, तो उसके अधिकारियों ने कहा, हमारा क्या कसूर है।

तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त (ट्रैफिक) सत्येंद्र गर्ग ने कहा, जो विभाग बस का परमिट जारी करता है, उसे ही परमिट रद्द करने की पावर है। ट्रैफिक पुलिस ने उस बस का आठ बार चालान किया और छह बार जब्त किया। परिवहन विभाग ने मामले की जांच में कहा, हमारे पास इसका रिकार्ड नहीं था।

गृह मंत्रालय ने खुद कराई मामले की जांच

अब इस मामले की जांच शुरू हुई कि उस बस का परमिट रद्द क्यों नहीं हुआ। चालान होने के बाद साधारण जुर्माना अदा कर यह बस हमेशा छूट जाती थी, ऐसा कैसे संभव हुआ। इस मामले की जांच के लिए गृह मंत्रालय में तत्कालीन संयुक्त सचिव वीणा कुमारी मीणा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया।

इस समिति ने एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश की थी। मामले से जुड़े अन्य तथ्यों की जांच के अलावा कमेटी ने यह भी पता लगाया कि जब इस बस का कई बार चालान हो चुका था, तो वह दिल्ली की सड़कों पर किस तरह दौड़ती रही। बस का परमिट रद्द हो सकता था तो फिर क्यों नहीं किया गया।

इसके पीछे अफसरों का हाथ है या कोई कानूनी बाधा, इस बाबत गहराई से जांच की गई। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन स्पेशल सीपी (लॉ एंड ऑर्डर) धमेंद्र कुमार ने ट्रैफिक पुलिस से चार्टर्ड बस के चालान से संबंधित रिकार्ड तलब किया था। उन्होंने भी परिवहन विभाग की लापरवाही मानी थी।



बाद में यह मामला आईएएस बनाम आईपीएस बन गया। दिल्ली के परिवहन विभाग में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। लोकल पुलिस भी बच गई। ट्रैफिक पुलिस के तीन अफसर, सत्येंद्र गर्ग, डीसीपी प्रेमनाथ और एक अन्य महिला पुलिस अधिकारी को कई साल तक इस मामले में उलझा कर रखा गया।

गृह मंत्रालय की जांच में ट्रैफिक पुलिस को क्लीन चिट मिली, लेकिन परिवहन विभाग को भी जांच में कसूरवार नहीं ठहराया गया।

 

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