फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   nirbhaya case mukesh plea stay on execution in patiala house court ask detail report from tihar

तारीख पर तारीख: निर्भया के गुनहगारों की फांसी की तारीख टलने के आसार

Thu, 16 Jan 2020 05:00 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Thu, 16 Jan 2020 05:00 PM IST
विज्ञापन
nirbhaya case mukesh plea stay on execution in patiala house court ask detail report from tihar
निर्भया का दोषी मुकेश सिंह - फोटो : सोशल मीडिया

निर्भया के गुनहगारों की फांसी की तारीख टलने के आसार दिख रहे हैं। एक दोषी मुकेश ने दिल्ली हाईकोर्ट में फांसी पर रोक की याचिका खारिज होने के बाद पटियाला हाउस कोर्ट में अर्जी डाली थी। आज सुनवाई के दौरान दोषी के वकील ने बताया कि मुकेश की दया याचिका लंबित है ऐसे में जेल मैनुअल के हिसाब से उसे 22 जनवरी को फांसी नहीं होनी चाहिए।

विज्ञापन


इस पर अदालत ने तिहाड़ प्रशासन को जेल मैनुअल के नियम संख्या 840 और 863 समेत विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है। जेल प्रशासन इस रिपोर्ट को शुक्रवार तक पेश करने के लिए राजी हो गया है।
विज्ञापन


इस दौरान कोर्ट ने कहा कि उसके संज्ञान में आया है कि तिहाड़ प्रशासन ने दया याचिका दाखिल होने की बात कहकर दोषियों की फांसी टालने के लिए सरकार को खत लिखा है और नई तारीख की मांग की है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


बता दें कि केस की सुनवाई की शुरुआत में एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) वृंदा ग्रोवर ने बताया कि इस केस में दो मामले सामने आए हैं- एक मुकेश की क्यूरेटिव पिटीशन खारिज हो गई और दूसरी, दया याचिका फाइल की गई है। ग्रोवर ने ये भी बताया कि राष्ट्रपति के पास मुकेश की दया याचिका लंबित है।
 

ग्रोवर ने बताया कि उन्होंने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चैलेंज नहीं किया था। उन्होंने सिर्फ ये बात कही है कि फांसी की तारीख पर रोक लगनी चाहिए जैसा कि शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत सरकार के केस में हुआ था। उन्होंने बताया कि फांसी की जो तारीख मुकर्रर की गई है, उस तारीख पर फांसी नहीं हो सकती क्योंकि अभी दोषी की दया याचिका लंबित है।

साथ ही ग्रोवर ने बताया कि वह मुकेश की दया याचिका इसलिए फाइल नहीं कर सकीं क्योंकि उनके पास दो दस्तावेज नहीं थे। उन्होंने ये भी कहा कि यह अदालत उनके लिए फांसी की तारीख पर रोक लगाने की अपील करने का सही मंच है।

ग्रोवर ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने इसलिए क्यूरेटिव पिटीशन खारिज नहीं की थी कि वह समय से फाइल नहीं की गई। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अदालत ने मुकेश को 18 दिसंबर को ही पेश होने को कहा था। दूसरे दोषियों के मामले में क्या हो रहा है उससे मुकेश के मामले पर असर नहीं होना चाहिए।

वृंदा ग्रोवर ने कहा कि हम अदालत में खेल नहीं खेल सकते। क्या आपराधिक न्याय प्रणाली में एक शख्स के लिए मौत की सजा से भी बड़ी कोई चीज हो सकती है। ग्रोवर ने कहा कि जब तक राष्ट्रपति के पास याचिका लंबित है तब तक दोषी को फांसी नहीं हो सकती।

ग्रोवर ने शत्रुघ्न चौहान केस के पैरा 19 का उल्लेख कर यह दलील दी कि मौत की सजा पाए शख्स को माफ करने की राष्ट्रपति की शक्ति उनकी संवैधानिक ड्यूटी है न कि कोई दया या खास प्रिविलेज। ग्रोवर ने आगे कहा कि मुझे पता है कि बहुत दुख है लेकिन वो कानून की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने इसी केस का हवाला देकर ये भी कहा कि 22 जनवरी को फांसी नहीं हो सकती।

ग्रोवर ने ये भी कहा कि जब मौत की सजा पाया शख्स जेल में बंद हो तो प्रशासन पिक एंड चूज का नियम अप्लाई नहीं कर सकती। मुझे उम्मीद है कि जेल प्रशासन उनक कानून का पालन कर रहा है जो कोर्ट में चलते हैं। राष्ट्रपति द्वारा दया की अस्वीकृति का तरीका न्यायिक समीक्षा के लिए उत्तरदायी है।

ग्रोवर ने आगे कहा कि जेल प्रशासन को कोर्ट को बताना चाहिए था कि मामले में क्या चल रहा है। मुकेश ने दया याचिका डाली है ऐसे में फांसी की तारीख को दरकिनार कर देना चाहिए। कानून की व्याख्या जेल प्रशासन के इमैजिनेशन पर नहीं छोड़ी जा सकती।

ग्रोवर ने ये भी कहा कि दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने ये बात सही कही कि 22 जनवरी को फांसी नहीं हो सकती। वृंदा ग्रोवर ने कहा कि मैं जेल प्रशासन पर क्या भरोसा करूं? वो लोग किसके निर्देश पर काम कर रहे हैं। अगर याचिकाकर्ता को फांसी देनी है तो एक कानून के आधार पर दिया जाना चाहिए। जब मैं अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग करूं तो मुझे इसके लिए दोष नहीं दिया जा सकता।

जब मैंने मुकेश की दया याचिका फाइल करने के लिए जेल प्रशासन से दस्तावेज मांगा तो उन्होंने कोई उचित जवाब भी नहीं दिया। इस पर सरकारी वकील ने कहा कि नियम 840 के अनुसार जेल सुपरीटेंडेंट को अधिकार है कि वह सरकार से आदेश प्राप्त कर डेथ वारंट पर स्टे लगा सके। उन्होंने ये भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के पास कोई ऐसा अधिकार नहीं है कि वह अपने द्वारा पास ऑर्डर पर रोक लगा सके।

जेल प्रशासन ने इस पर कहा कि जेल मैनुअल के नियम 840 के तहत, हमें केवल अदालत से आदेश प्राप्त करने के बाद अदालत को अवगत कराना होता है। इस पर जज ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 413 के अनुसार वो जज जो डेथ वारंट जारी करता है उसे कोई फैसला देने का अधिकार नहीं है।

जज ने यह भी नोट किया कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निचली अदालत में याचिका डालने की आजादी दी है ताकि ट्रायल कोर्ट को इस बात की जानकारी हो सके कि डेथ वारंट जारी करने के बाद केस में क्या प्रगति हुई है। जज ने कहा कि उन्हें अपना आदेश रिव्यू करने का अधिकार नहीं है।

जज ने आगे कहा कि इस कोर्ट को जो बात बताई गई है कि दया याचिका फाइल की गई है इसलिए फांसी नहीं हो सकती, ये बताना काफी नहीं है। इसीलिए जज ने तिहाड़ प्रशासन को जेल मैनुअल के नियम 840 और 863 के साथ ही विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा। जिसके लिए जेल प्रशासन ने शुक्रवार को रिपोर्ट जमा करने पर हामी भरी है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed