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निर्भया गैंगरेप के दोषी की याचिका खारिज, कोर्ट ने माना 2012 में नाबालिग नहीं था पवन

Mon, 20 Jan 2020 03:14 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Mon, 20 Jan 2020 03:14 PM IST
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Nirbhaya Case convict pawan gupta plea in supreme court on juvenility verdict
- फोटो : अमर उजाला

निर्भया के गुनाहगारों में से एक पवन गुप्ता की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है और उसे 2012 में बालिग माना है। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला लिया कि यह मामला पहले भी उठाया गया है और निचली अदालतों ने इसे खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का फैसला सही था और हमें इस याचिका में कोई नई बात नहीं दिखाई देती, इसलिए यह याचिका खारिज की जाती है।

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 बता दें कि पवन ने याचिका में कहा है कि वह दिसंबर 2012 में नाबालिग था। उसकी ऐसी ही याचिका दिल्ली हाईकोर्ट ठुकरा चुका है जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपराध के वक्त नाबालिग होने की अर्जी डाली है। साथ ही उसने एक फरवरी को होने वाली फांसी पर रोक लगाने के लिए भी याचिका डाली है। नीचे पढ़िए अदालत में क्या कार्यवाही हुई...

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अदालत में क्या-क्या हुआ
सुनवाई शुरू होते ही दोषी पवन के वकील एपी सिंह ने पवन के स्कूल सर्टिफिकेट को दिखाकर कहा कि उसका जन्म 8 अक्तूबर 1996 में हुआ था। इस पर जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि यह सर्टिफिकेट 2017 में पेश किया गया जब आरोपी को दोषी करार दिया जा चुका था।

फिर जस्टिस भानुमति ने पूछा- किसने दस्तावेज लेने के लिए आवेदन दिया था? तब दोषी के वकील ने कहा मैंने याचिका डाली थी। वकील ने आगे दलील देते हुए कहा कि हर जगह यह केस निर्भया के नाम से दर्ज है। जबकि इस केस का अधिकारिक नाम निर्भया नहीं है। वकील एपी सिंह ने कहा कि पवन की उम्र छिपाने के लिए बड़ी साजिश रची गई है।

इस पर जस्टिस भूषण ने पूछा कि आप पवन की उम्र को लेकर जो सवाल उठा रहे हैं जिस पर यहां कार्यवाही हो चुकी है। क्या आपको उसी मुद्दे को नए सबूत के साथ लाने की इजाजत दी जा सकती है?

सॉलिसीटर जनरल ने अपनी दलील में कहा कि यह याचिका उन्हीं दस्तावेजों पर डाली गई है, जिस पर पहली भी डाली जा चुकी है। उनकी इस बात से जस्टिस भानुमति ने सहमति जताई।

एपी सिंह ने जोर दिया कि हमारे पास नए दस्तावेज हैं। लेकिन अदालत इस बात पर सहमत नहीं दिखी। जस्टिस भानुमति ने कहा कि सवाल तो वही है कि अगर आप इस तरह याचिकाएं लगाते रहे तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा।

सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में आ चुका है। फिर जस्टिस भानुमति ने कहा कि आपने ये मामला निचली अदालत में, हाईकोर्ट में और इस कोर्ट में भी उठाया। इसे खारिज कर दिया गया।

फिर जस्टिस भूषण ने पवन के वकील से कहा कि अगर ये मामला पहली बार उठाया गया होता तो यह अलग होता लेकिन आप इसे पहली बार नहीं उठा रहे हैं। तब एपी सिंह ने बताया कि उस वक्त निचली अदालत में कोई वकील नहीं था। सिर्फ सरकारी वकील को सुनकर ही ट्रायल कोर्ट ने नाबालिग होने की याचिका पर फैसला दिया था।

इस बात से इनकार करते हुए जस्टिस भूषण ने बताया कि पवन की नाबालिगता पर जो आदेश 2013 में ट्रायल कोर्ट ने सुनाया था उसमें दर्ज है कि पवन अपने वकील के साथ पश हुआ था।

तब एपी सिंह ने कहा कि उस वक्त पवन के नाबालिग होने पर कुछ तय नहीं हुआ था क्योंकि सबकुछ बहुत जल्दबाजी में हुआ था। जल्दी की वजह से निष्पक्ष बहस नहीं हुई थी। ट्रायल कोर्ट में न्याय नहीं हो पाया था। उस वक्त मीडिया ट्रायल हुआ। लोगों की राय का इस्तेमाल हुआ और ऐसा फैसला निष्पक्ष नहीं हो सकता।

इस पर जस्टिस भानुमति ने कहा कि हम पवन के नाबालिग होने पर चर्चा कर रहे हैं, आप मुद्दे पर आइए। तब एपी सिंह ने कहा कि देखिए कि किस तरह से जज के सामने चार्जशीट पेश की गई और कैसे आदेश आ गया। मामले में जल्दबाजी तो देखिए। नाबालिग होने पर ध्यान ही नहीं दिया गया।

तब जस्टिस भानुमति ने कहा कि निचली अदालत ने इस मुद्दे पर ध्यान दिया था और याचिका पर भी। तब एपी सिंह ने कहा कि निचली अदालत का फैसला आने के बाद मैं पवन के पास गया तो उसने कहा कि एज प्रूफ के लिए मेरे स्कूल जाइए। तब मैं स्कूल गया और वहां से सभी दस्तावेज लेकर आया वो सभी सत्यापित हैं।

दोषी के वकील आगे बोले कि अगर यह लगता है कि उसकी उम्र स्कूल में गलत लिखाई गई है तो स्कूल में दाखिला इसका सबूत है। पवन के अभिभावक पहले से कैसे यह कल्पना कर सकते थे कि उनका बेटा बड़ा होकर कोई अपराध करेगा। या फिर वो कैसे सोच सकते थे कि उनका बेटा निर्भया केस में गुनहगार होगा तो उसकी उम्र कम लिखा दो।

जब एपी सिंह बोल रहे थे तो जस्टिस भानुमति सॉलिसीटर जनरल की बात सुनना चाहती थी इस पर एपी सिंह ने उन्हें टोका। एपी सिंह ने कहा कि मुझे बहस करने दीजिए, निचली अदालत ने मेरी बात नहीं सुनी, देखिए कैसे न्याय की हत्या की गई। अब जब आप सुनवाई कर रही हैं तो मुझे बोलने दीजिए। इस पर सुनवाई कर रही पीठ एपी सिंह को पांच मिनट देने के लिए तैयार हो गई।

एपी सिंह के बाद सॉलिसीटर जनरल(एसजी) ने बोलना शुरू किया। उन्होंने कहा सात जनवरी 2013 को पवन की उम्र पता लगाने को कहा गया था। 10 जनवरी 2013 को उम्र वेरिफिकेशन रिपोर्ट फाइल की गई और ये बात रिकॉर्ड में दर्ज है। सत्यापित कापियां जमा की गई हैं। इसके साथ ही जन्म प्रमाणपत्र भी फाइल किया गया है। कानून के मुताबिक किसी की उम्र का सबूत जन्म प्रमाणपत्र ही है।

एसजी ने मजिस्ट्रेट के आदेश को पढ़कर सुनाया जिसमें कहा गया है कि, 'आरोपी ने उम्र को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई है। उसने 18 साल से ज्यादा के होने पर कोई आपत्ति भी नहीं उठाई है। उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।' एसजी ने आगे बताया कि एपी सिंह ने जिस दस्तावेज के हिसाब से याचिका डाली है, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका के दौरान संज्ञान लिया था। लेकिन सुप्रीम ने उसे खारिज कर दिया।

एसजी ने पुनर्विचार याचिका के दो पैराग्राफ पढ़कर सुनाए जिसमें लिखा था कि अदालत को एज वेरिफिकेशन रिपोर्ट मिल गई है और पवन एक बालिग है। निचली अदालत ने सही कहा है कि पवन नाबालिग नहीं है। अब अगर इस स्टेज पर यह बात फिर से उठाई गई तो यह न्याय के साथ खिलवाड़ होगा क्योंकि इस आधार को सभी पड़ाव पर खारिज किया गया है।

एपी सिंह ने फिर कहा कि उनकी याचिका में नए सबूत नए दस्तावेज हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश दोपहर 2.30 बजे तक के लिए सुरक्षित रख लिया। जब करीब एक घंटे बाद दोबारा सुनवाई शुरू हुई तो वकील एपी सिंह ने कहा कि इससे पहले आप आदेश पारित करें मैं यह बताना चाहता हूं कि स्कूल से नए सबूतों पर कहीं भी विचार नहीं किया गया है। यह मेरा सबमिशन भी है कि एसजी ने मेरे विवाद का खंडन नहीं किया।

इस पर जस्टिस भानुमति ने कहा कि
यह मामला पहले भी उठाया गया है और निचली अदालतों ने इसे खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का फैसला सही था और हमें इस याचिका में कोई नई बात नहीं दिखाई देती, इसलिए यह याचिका खारिज की जाती है।

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