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National Doctors' Day: भारत ट्रैकोमा मुक्त, लोगों को दी आंखों की नई रोशनी; जानें एम्स के डॉ. वशिष्ठ क्या बोले

Tue, 01 Jul 2025 07:56 AM IST
अनुज कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Tue, 01 Jul 2025 07:56 AM IST
सार

भारत ट्रैकोमा मुक्त घोषित हो गया। साल 2010 से 2024 तक एक लंबा संघर्ष चला। सबसे पहले बच्चों और फिर वयस्कों में हुई समस्या दूर हो गई। एम्स के आरपी सेंटर में सामुदायिक नेत्र विज्ञान के प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने देश में चल रहे ट्रैकोमा मुक्त अभियान को आगे बढ़ाया।

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National Doctor Day today country declared trachoma free
आंखों की देखभाल - फोटो : Freepik.com

विस्तार

करीब 15 साल पहले का समय रहा होगा। दिल्ली से मीलों दूर आंखों में रोशनी होने के बाद भी अंधकार में डूबे लोगों की जिंदगी बदलने का फैसला लिया गया। यह संघर्ष लंबा चला और आज देश ट्रैकोमा मुक्त घोषित हो गया। इस प्रयास को सफल बनाने में एम्स के कुछ डॉक्टरों की लंबी संघर्ष भरी कहानी है, जिन्होंने परिवार को छोड़कर उनके बीच समय गुजारा। डॉक्टर दिवस पर इनकी कहानी बयां करती अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट...
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अभियान को अंजाम तक पहुंचाया
एम्स के आरपी सेंटर में सामुदायिक नेत्र विज्ञान के प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने देश में चल रहे ट्रैकोमा मुक्त अभियान को आगे बढ़ाया। इस रोग के कारण आंखों की रोशनी तक चली जाती है। साल 2010 में निकोबार द्वीप में ट्रेकोमा का भारी बोझ था। डॉ. वरिष्ठ के नेतृत्व में एम्स की टीम ने सर्वेक्षण किया और पूरी आबादी के लिए बड़े पैमाने पर उपचार की सिफारिश की। 2014 में ट्रेकोमा उन्मूलन के लिए देश भर में अभियान को तेज कर दिया। लंबी कोशिश के बाद 2017 में बच्चों में ट्रेकोमा के उन्मूलन की घोषणा हुई। उसके बाद 200 पूर्व स्थानिक जिलों में एसएएफई रणनीति को लागू कर 15 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए मेगा सर्वेक्षण हुआ। 2021 से 2024 तक घर-घर जाकर 6 लाख से अधिक लोगों की जांच की गई। इस रोग के उन्मूलन के लिए लंबे संघर्ष के बाद डब्ल्यूएचओ ने भारत को ट्रेकोमा मुक्त घोषित किया।

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जनजाति समुदाय के बीच किया संघर्ष
एम्स के आरपी सेंटर में नेत्र विज्ञान की सहायक प्रोफेसर डॉ. नूपुर गुप्ता साल 2010 में निकोबार द्वीप को ट्रेकोमा मुक्त करने के अभियान से जुड़ीं। उस समय द्वीप पर 50 फीसदी लोगों में यह समस्या थी। वह बिना डरे टीम के साथ जनजाति समुदाय के बीच पहुंचकर लोगों की जांच करती रहीं। जांच के बाद पीड़ितों को दवा देना। घंटों सफर कर सैंपल एम्स दिल्ली लाना। द्वीप पर निरंतर जांच करना जारी रखा। करीब तीन साल के लंबे संघर्ष के बाद ट्रेकोमा रोग की दर को 6 फीसदी तक पहुंचा। डॉ. गुप्ता का कहना है कि दिल्ली से हजारों मील दूर जटिल स्थिति में इस समस्या को दूर करना बड़ी चुनौती रहा। यह रोग एक से 9 साल के बच्चों में होने की आशंका ज्यादा रहती है।

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गर्भवती महिलाओं को किया जागरूक
कैंसर को हराकर फिर जिंदगी हासिल करने वाली स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की  डॉ (कर्नल) गुंजन मल्होत्रा प्रैक्टिस के साथ सामाजिक सेवाएं भी कर रही हैं। वह नियमित करोल बाग की बस्ती, जीबी रोड सहित दूसरे जटिल जगहों पर जाकर महिलाओं की जांच करती हैं। महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर के अलावा गर्भवती महिलाओं में होने वाली परेशानी के बारे में जागरूक करना, उनकी जांच करना और जांच के बाद यदि किसी में कोई गंभीर समस्या दिखती है तो उनका मौलाना आजाद, डॉ. राम मनोहर लोहिया सहित अन्य अस्पताल में इलाज करवाती हैं। अब तक इस प्रयास की मदद से दिल्ली में सैकड़ों महिलाएं इलाज करवा चुकी हैं। काफी महिलाओं को शुरुआती दौर में ही कैंसर व दूसरे रोग का पता चला जिससे उनकी होने वाली परेशानी दूर हुई।

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