दिल्ली से गायब हो रहे हैं कब्रिस्तान
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एक वक़्त था जब इस शहर में क़रीब 500 क़ब्रिस्तान थे, लेकिन आज इनकी तादाद एक चौथाई भी नहीं रह गई है। ये बात और है कि क्लिक करें दस्तावेज़ों में कहानी कुछ अलग है। दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के मुताबिक़ दिल्ली में आज भी 488 क़ब्रिस्तान हैं, लेकिन ज़मीन पर ये नज़र नहीं आते हैं।
दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के सेक्शन अफ़सर ख़ुर्शीद आलम फ़ारूक़ी बताते हैं कि दिल्ली में अभी 70-80 क़ब्रिस्तान ही ज़िन्दा हैं। यानी सिर्फ़ इन्हीं क़ब्रिस्तानों में मृत व्यक्ति को दफ़नाया जा सकता है।
1971 की जनगणना के मुताबिक़ दिल्ली में सिर्फ साढ़े छह फ़ीसदी ही मुसलमान थे तो वहीं अब एक करोड़ 78 लाख आबादी वाली दिल्ली में मुसलमानों का प्रतिशत 11.7 है।
ख़ुर्शीद आलम फ़ारूक़ी बताते हैं कि क्लिक करें ज़्यादातर क़ब्रिस्तान ग़ायब हैं। अधिकतर क़ब्रिस्तानों पर अनाधिकृत क़ब्ज़े हैं तो कुछ क़ब्रिस्तानों की ज़मीन का इस्तेमाल सरकार दूसरे कामों में कर रही है।
वेलफ़ेयर पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एसक्यूआर इलियास को सूचना के अधिकार (आरटीआई) से मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के 1970 की सरकारी अधिसूचना में 488 मुस्लिम क़ब्रिस्तान दर्ज हैं।
कहां गए सारे क़ब्रिस्तान
आरटीआई से हासिल दस्तावेज़ों के मुताबिक़ 158 वक़्फ की सम्पत्तियों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का कब्ज़ा है, जिनमें 11 क़ब्रिस्तान भी शामिल हैं।
हालांकि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक डॉक्टर बीआर मणि इस आरोप से इनकार करते हैं। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, "क्या सरकार कभी गैर-क़ानूनी क़ब्ज़ा करती है?"
उनका कहना है, "पुरातत्व विभाग उन्हीं क्लिक करें धरोहरों को अपनी देख-रेख में लेता है, जिनका ऐतिहासिक महत्व होता है। हो सकता है कि वक़्फ बोर्ड की कोई ऐसी धरोहर हो, जिसके साथ क़ब्रिस्तान भी जुड़ा हुआ हो। वरना हम क्यों क़ब्रिस्तान को अपनी देख-रेख में लेंगे?"
इतना ही नहीं, जब हमने वक़्फ़ बोर्ड की सम्पत्तियों की सूची को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि राष्ट्रीय राजधानी में कुल 562 छोटे-बड़े क़ब्रिस्तान हैं।
इनमें से कुछ दरगाह या मस्जिद से जुड़े हुए हैं और कुछ अलग से हैं। लेकिन अब दिल्ली वक़्फ बोर्ड सिर्फ 488 क़ब्रिस्तान ही बता रहा है। सवाल यह भी उठता है कि क़ागज़ों में क़ब्रिस्तानों की संख्या 562 से घटकर 488 कैसे रह गई?
कब्रिस्तान की जमीन पर बना है पार्क
इस सवाल के जवाब में दिल्ली वक़्फ बोर्ड के सेक्शन ऑफिसर बताते हैं कि वो पहले के दस्तावेज़ होंगे। पहले तकिया या खानख्वाह को भी लोग क़ब्रिस्तान में ही गिनते थे। घटते क़ब्रिस्तान अब दिल्ली के मुसलमानों के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं।
आलम यह है कि क़ब्रिस्तानों के प्रबंधन से जुड़े लोगों ने एक बैठक आयोजित कर यह फैसला लिया है कि अब से किसी भी क़ब्रिस्तान में पक्की कब्र बनाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी।
दिल्ली के मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के कैंपस में स्थित प्रसिद्ध निजी क़ब्रिस्तान 'मेहदियान' में अब ज़मीन कम पड़ने लगी है। मेहदियान के केयरटेकर वली मोहम्मद बताते हैं कि इस क़ब्रिस्तान में 400 से अधिक धार्मिक विद्वान दफन हैं. इसलिए हर कोई चाहता है कि उन्हें यहां दफनाया जाए। लेकिन ज़मीन की किल्लत को देखते हुए जिनके पूर्वज यहां दफन हैं, उन्हें पूर्वजों की कब्रों में ही दफ़नाए जाने की इजाज़त दी जाती है।
वो बताते हैं कि उर्दू के मशहूर शायर हकीम मोमिन खां मोमिन भी इसी क़ब्रिस्तान में दफ़न हैं। आरटीआई से मिले दस्तावेज़ों के मुताबिक दिल्ली का इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क भी क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर ही बना है।