दिल्लीः इस मामले में AAP से पिछड़ गई BJP
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70 सीटों वाली दिल्ली विधान सभा के लिए चुनावी बिगुल बज चुका है। असल लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच बताई जा रही है लेकिन कांग्रेस को गंभीरता से न लेने की गलती भी कोई नहीं कर रहा है।
सभी पार्टियों ने चुनाव क्षेत्रों की जनसंख्या को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारे हैं क्योंकि दिल्ली प्रदेश के लगभग हर हिस्से से आकर रहने वालों की संख्या बढ़ी है।
यही वजह है कि तमाम उम्मीदवार ऐसे हैं जिनका ताल्लुक़ उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड या राजस्थान से है। वहीं आज अरविंद केजरीवाल का एक ट्वीट यह दिखाता है कि पूर्वांचलियों को हिमायती कही जाने वाली बीजेपी ने ही उन्हें केवल 3 टिकटें दी हैं।
'हमारी दिल्ली'
दोपहर 11 बजे का समय है और द्वारका के निकट बसे महावीर इन्क्लेव में रंजीता झा के तीन मंज़िला घर में चहल पहल है। दरभंगा, बिहार की रहने वाली रंजीता पिछले 12 वर्षों से दिल्ली में रह रहीं हैं और यहाँ की मतदाता हैं।
उन्होंने बताया, "जब तक नेता चुनाव नहीं जीतते हैं तब तक उन्हें एहसास रहता है कि यूपी और बिहार के वोटरों को खुश रखना है। आखिर लोग गाँव छोड़ कर नौकरी और बच्चों की पढाई के लिए यहाँ रहने आए हैं। हम लोग तो दिल्ली को अपना चुके हैं लेकिन दिल्ली को भी हमें मिलने वाली बिजली-पानी का ध्यान रखना चाहिए"।
रंजीता हर वर्ष लगभग बीस हज़ार रुपए में पीने का साफ़ पानी खरीदती हैं लेकिन उनके लिए पानी के साथ-साथ महिलाओं की सुरक्षा इन चुनावों में एक बड़ा मुद्दा हैं।
बढ़ती तादाद
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली की आबादी लगभग दो करोड़ हो चुकी है और इसमें निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। ज़ाहिर है, पड़ोसी राज्यों, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के अलावा भी लोग रोज़गार और पढाई की तलाश में दिल्ली पहुँच रहे हैं।
इसका सीधा असर विधान सभा की सीटों पर पड़ता है। सात संसदीय क्षेत्रों और 70 विधान सभा सीटों में बंटी दिल्ली की कम से कम 25 सीटें ऐसी हैं निर्णायक मत उन दिल्ली वासियों के हैं जो किसी दूसरे प्रदेश से यहाँ आकर बसे।
उत्तर पश्चिमी और पश्चिमी दिल्ली के साथ पूर्वी और उत्तर पूर्वी दिल्ली में इन लोगों का प्रतिशत ज़्यादा बताया जाता है।
वोट की शक्ति
20 वर्षों से पश्चिमी दिल्ली में रह रहे भारतीय सेना से सेवानिवृत हुए कर्नल आनंद कहते हैं कि दिल्ली में यूपी और बिहार की जनसँख्या करीब 20 वर्ष पहले बढ़नी शुरू हुई।
उन्होंने कहा, "इन प्रदेशों में जब पढ़ाई का स्तर घटने लगा और सुरक्षा के सवाल उठने लगे तब वहां के तमाम लोगों ने दिल्ली के लिए कूच किया। एक दशक लगा है दिल्ली की जनसांख्यिकी पर इसका असर दिखने में लेकिन अब दिल्ली में छठ की छुट्टी होती है, बसों में कॉलेज के बच्चों या मज़दूरों को बिहारी या यूपी के भैय्ये कह कर नहीं बुलाया जाता। इसका असर राजनीति पर भी दिखता है क्योंकि शीला दीक्षित जैसों को एक बार उत्तर प्रदेश के लोगों पर सफ़ाई के मामले में कथित कटाक्ष वाली टिप्पणी वापस लेनी पड़ी थी."
हालांकि कर्नल आनंद को लगता है कि दूसरे प्रदेश के लोगों की संख्या बढ़ने के बाद उनकी और उनके वोट की शक्ति को दिल्ली में राजनीतिक दल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
पूर्वांचलियों के बढ़ते दबदबे को ही देखते हुए पिछले साल भाजपा ने दिल्ली में छठ पूजा पर सार्वजनिक छुट्टी का ऐलान कर दिया था। लेकिन जब सीटों के बंटवारे की बात आई तो केवल 3 उम्मीदवारों को ही टिकट दिया जबकि आम आदमी पार्टी ने 11 पूर्वांचलियों को टिकट दिया है। ये बात केजरीवाल ने आज अपने एक ट्वीट में बताई।
घर की याद
राजधानी दिल्ली के कई इलाकों में जाकर ऐसा लगा जैसे किसी दूसरे प्रदेश में आए हैं। उत्तम नगर के मोहन गार्डन और सेवक पार्क में तो सिर्फ बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से आकर बसे लोग ही मिले।
इनमें से ज़्यादातर दिल्ली के मतदाता है और अब इसे अपना घर मानते हैं। ताल ठोक कर यहाँ की राजनीति में दखल भी देते हैं और राय भी रखते हैं।
वर्षों पहले रेवाड़ी से आकर दिल्ली में बसी कांता देवी ने कहा, "सीवर से लेकर बिजली तक की समस्याएं तो हैं लेकिन नेता लोग इस बात को पूरी तरह समझ नहीं रहे हैं कि हमारी तरह लाखों लोग अपना गाँव छोड़कर यहाँ के हो चुके हैं।"
कांता देवी के अनुसार दिल्ली का दिल तो बड़ा है लेकिन अभी भी बाहर वालों के लिए चीज़ें बेहतर हो सकती हैं।