श्रमिक ट्रेन से घर जाने के लिए गुरुग्राम से पैदल पहुंचे गाजियाबाद, पुलिस ने रोका तो छलक पड़े आंसू
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लॉकडाउन में पैसा-रोजगार खत्म हो जाने के बाद अब घर जाने की उम्मीद लिए हजारों प्रवासी श्रमिक शनिवार को गाजियाबाद के घंटाघर रामलीला मैदान पहुंचे। इनमें अधिकांश श्रमिकों के पास प्रशासन की ओर से मोबाइल पर भेजा गया बुलावे का मैसेज था तो कुछ लोग बिना मैसेज ही श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार होने के लिए पहुंच गए।
पुलिस ने उन्हें रामलीला मैदान के गेट पर रोका तो उनका दर्द छलक गया। गुरुग्राम से अपनी पत्नी और छह माह की बेटी को लेकर पैदल गाजियाबाद पहुंचे भागलपुर बिहार निवासी तबरेज आलम का कहना था कि ‘माता-पिता अपने हिस्से के गेहूं-चावल बेचकर कब तक पैसा भेजते रहेंगे। साहब, अब घर जाने दो।’
तबरेज आलम और उनके साथ गांव के 25 लोग गुरुग्राम में रहते थे। तबरेज ओरिएंट ग्राफ नाम की एक एक्सपोर्ट कंपनी में सिलाई का काम करते थे। उनके साथ के अन्य लोग भी ऐसे ही मजदूरी का काम करते थे। उसकी महीने की कमाई से पत्नी रिजवाना और छह माह की बेटी का खर्च चलता था।
तबरेज का कहना है कि लॉकडाउन में उनका रोजगार और 4-5 हजार की जमापूंजी भी खत्म हो गई। अपनी बेबसी पिता को बताई तो गांव में गेहूं-चावल बेचकर तीन हजार रुपये उनके लिए भेज दिए।
यह रकम भी अब खत्म होने लगी तो उन्होंने घर जाने का निर्णय लिया और श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए पंजीकरण कराया। इसके बाद शनिवार को गुरुग्राम से पत्नी और बच्ची को लेकर पैदल गाजियाबाद पहुंच गए।
बिना काम अब जी नहीं लगता इस शहर में
सीतामढ़ी, बिहार के गांव रीगा मजोरा के रहने वाले मनोहर का रोजगार भी इस कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन में छिन गया। दैनिक मजदूरी करने वाला मनोहर अपनी पत्नी देवबाला, दो साल की बेटी और दुधमुंहे बच्चे के साथ कोटगांव में किराए पर रहता था।
मनोहर का कहना है कि रोजाना जो कमाते थे, उसी से घर में चूल्हा जलता था। उनके गांव के 10 अन्य लोग आसपास ही रहते हैं और दैनिक मजदूरी करते हैं। मनोहर ने बताया कि अब काम नहीं रहा, जेब में पैसा नहीं बचा तो गाजियाबाद में उनका दिल नहीं लगता।
वह गांव जाने के लिए शनिवार को रामलीला मैदान पहुंचे थे। हालांकि उनके पास प्रशासन की ओर से कोई मैसेज नहीं आया था, लेकिन पंजीकरण कराए जाने की वजह से उन्हें उम्मीद थी कि शायद प्रशासन के अधिकारी उन्हें ट्रेन में बैठने की इजाजत दे दें।