गोकशी और तस्करी के लिए बदनाम यहां के मुसलमान सदियों से पाल रहे गाय
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नूंह एक तरफ मेवात गोकशी व तस्करी को लेकर बदनाम है, वहीं यहां के मुस्लिम समुदाय में बड़ी संख्या में ऐसे पशुपालक भी हैं जो गोवंश पालते हैं। कुछ पशुपालक तो यहां तक कहते हैं कि आज उनके पास किसी चीज की कमी नहीं हैं। भरा-पूरा परिवार है, माली हालत काफी अच्छी है और यह सब गाय के कारण ही संभव हुआ है।
मेवात में आज भी पशुपालकों के पास 50 से 300 गाय तक हैं। इन मुस्लिम पशुपालकों का मानना है कि गाय के कारण उनके परिवार का अच्छा भरण-पोषण हो रहा है और घर में सुख समृद्धि है। गायों से इनकी अच्छी आजीविका चलती है, गाय के दूध को बेचते हैं और गोबर से भी अच्छी खासी आमदनी हो जाती है।
पहाड़ के गांवों में संख्या अधिक :
गाय पालन का काम अधिकतर अरावली पहाड़ के साथ लगते गांवों के लोग करते हैं। क्योंकि इन गायों को चराने के लिए वे आसानी से पहाड़ों में छोड़ देते हैं और शाम को पेट भरने के बाद घर ले आते हैं। गांव घासेड़ा, मेवली, बाई, कंसाली, घागस, नगीना, करहेडा, बघोला, भौंड आदि कई गांव ऐसे हैं जिनमें एक-एक गांव में 4-5 पशुपालक ऐसे मिल जाते हैं, जिनके पास 50 से अधिक गाय हैं। बघोला निवासी जुबैर, इमरान, हनीफ, भौंड निवासी हुरमत, घागस निवासी ईसब के पास 80 गाय हैं। करहेड़ा के दीनदार, घासेडा के अब्दुल रज्जाक के पास 50 गाय हैं। इन सभी के पास देसी सफेद गाय हैं।
गाय लाती है बरकत
भौंड निवासी हुरमत व घासेड़ा निवास अब्दुल रज्जाक का कहना है कि जब से उन्होंने गाय पालनी शुरू की है, उनके दिन बदल गए हैं। आज उनके भरा-पूरा परिवार हैं। आर्थिक हालत काफी अच्छे हैं और किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है। उनका कहना है कि जो लोग गाय की हत्या व तस्करी का काम करते हैं, वे इंसानियत व भाईचारे के दुश्मन हैं। पशुपालकों का मानना है कि वे गाय को नहीं, गाय उनके परिवारों को पाल रही है।
दूध-गोबर से आमदनी :
पशुपालकों ने बताया कि वे गाय का दूध हाथों-हाथ बिक जाता है। वे 25 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक गाय का दूध बेचते हैं। गाय का गोबर भी बेचा जाता है। गोबर की ट्रॉली 1 हजार रुपये से लेकर 1500 रुपये तक बेची जाती है। साथ ही जिस किसान को अपने खेत में खाद डलवाना होता है, उसके खेत में यह डाला जाता है। किसान से एक दिन के 200 रुपये लेते हैं तो कहीं 1 एकड़ जमीन को खाद से भरने के लिए 1 हजार से 1300 रुपये तक लेते हैं। गाय का गोबर व मूत्र से अच्छी खाद बनती है जिससे फसल भी अच्छी होती हैं। घासेड़ा के अब्दुल रज्जाक ने बताया कि उनका पूरा परिवार गाय की सेवा करता है, गाय बीमार हो जाती है तो उसे दवा दिलाई जाती है।
मेवात में अच्छे गो पालक :
गो सेवा आयोग के चेयरमैन भानी राम मंगला भी मेवात के ही रहने वाले हैं और गायों के उद्दार के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। मंगला का कहना है कि मेवात में आज भी काफी अच्छे गो पालक हैं, लेकिन चंद लोगों के कारण मेवात का नाम बदनाम होता है। मेवात को बदनामी से बचाने के लिए लोगों को आगे आना होगा और इस प्रकार के लोगों का बहिष्कार करना होगा, जो अपने स्वार्थ के लिए मेवात को बदनाम कर रहे हैं। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे 13 तारीख को बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी न दें, गाय से एक समुदाय की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। वे इसे लेकर जल्द ही मेवात में सभाएं कर लोगों को जागरूक करेंगे।