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निर्भया बरसी: मानसिक क्षमता के मद्देनजर तय होता है नाबालिग पर कहां चलेगा मुकदमा

Mon, 17 Dec 2018 05:12 AM IST
राजेश सैनी धीरज बेनीवाल, नई दिल्ली
धीरज बेनीवाल, नई दिल्ली Published by: राजेश सैनी Updated Mon, 17 Dec 2018 05:12 AM IST
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Mental capacity Decided case of a minor in sexual assault that Which Court can hear the matter
Arrest

निर्भया दरिंदगी मामले में एक नाबालिग भी आरोपी था। इसके बाद जघन्य मामलों में नाबालिग आरोपियों पर व्यस्कों की तरह मुकदमा चलाने की मांग उठी थी। इसके बाद कानून में बदलाव किया गया था। अब 16-18 साल के नाबालिग पर भी वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का प्रावधान है। इसके लिए यह देखा जाता है कि नाबालिग अपराध के समय मानसिक तौर पर कितना परिपक्व था।

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जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (संशोधित) के मुताबिक, 16 साल या उससे बड़े नाबालिगों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके लिए जुवेनाइल के खिलाफ पुलिस के आरोप पत्र पर संज्ञान लेने के बाद जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) विशेषज्ञ से रिपोर्ट मंगाता है। विशेषज्ञ इसमें बताता है कि जो अपराध नाबालिग ने किया, वह उसका परिणाम समझने के लिए परिपक्व था या नहीं। इसके लिए नाबालिग के पारिवारिक, सामाजिक व शैक्षिक पहलुओं की जांच की जाती है। इसमें यह भी देखा जाता है कि नाबालिग कोई नशा तो नहीं करता और उसकी दोस्ती किस तरह के लड़कों से है।
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जेजेबी के समक्ष पेश रिपोर्ट अगर कहती है कि नाबालिग अपने अपराध का परिणाम समझने में सक्षम था तो उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने के लिए केस सत्र अदालत भेज दिया जाता है। इन हालात में उसे आजीवन कारावास तक सजा सुनाई जा सकती है। इस दोषी को 18 साल की आयु तक सुधार गृह और उसके बाद जेल में रखने का प्रावधान है। दूसरी ओर, अगर रिपोर्ट कहती है कि नाबालिग अपराध के परिणाम को समझने में सक्षम नहीं था तो उस पर जेजेबी में ही मुकदमा चलाया जाता है। इन हालात में कानूनी प्रावधान के तहत उसे अधिकतम तीन साल कैद की सजा ही सुनाई जा सकती है। इस दौरान उसे सुधार गृह में रखा जाता है।

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