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क्या अब भी महिला प्रतिनिधियों की जगह पुरुष करेंगे चौधराहट?
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
Updated Thu, 04 Feb 2016 07:25 PM IST
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प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनावों में पढे-लिखे लोगों को आगे आने की पहल कर एक अच्छा कदम उठाया है। पंचायत चुनावों में जहां महिला सीटें आरक्षित थी, वहां चुनाव लडने के लिए किसी ने दूसरी शादी की तो कोई बिना दहेज के शादी कर चुनावों के लिए दुल्हन लाया।
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लेकिन मेवात जैसे क्षेत्र में क्या ये पढी-लिखी महिलाएं पर्दे से बाहर आकर गांव में सरपंची कर सकेंगी, यह अभी भी एक बडा प्रश्न हैं। क्योंकि यहां अब से पहले भी महिलाएं पंच, सरपंच, ब्लाक समिति सदस्य बनती रही है, लेकिन उनके स्थान पर उनके पति या अन्य परिजनों ने ही प्रधानी की हैं।
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चुनी गई प्रतिनिधी केवल रबड स्टांप बनी रहती हैं। जो न केवल पंचायती राज संस्थाओं की महत्वता के लिए एक मजाक हैं। बल्कि सरकार की महिला सशक्तिकरण की योजना में भी बडी बाधा हैं।
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हालांकि पढी-लिखी महिलाएं जब सरपंच बनी हैं तो सरकार की इस मुहिम को काफी सहारा मिलने की उमीद हैं। लेकिन रुढिवादी सोच के चलते उनका पर्दे से बाहर निकलना एक बडी चुनौती ही दिखाई दे रहा हैं।
मेवात के सिंगार गांव में अपने पति की सरपंच की विरासत को बनाए रखने के लिए पत्नी ने सौतन लाकर बडी हिमत दिखाई और रुढिवादी सोच रखने वाले लोगों को संदेश भी दिया।
हालांकि वह सौतन चुनाव तो नहीं जीत पाई, लेकिन स्वयं और गांव की अन्य महिलाओं को इस रूढिवादी सोच से बाहर निकालपाना बडी चुनौती हैं।
सैंकडों महिलाएं बनी प्रधान: मेवात में इस बार सैंकडों महिला चुनाव जीतकर अपने गांव या वार्ड का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
जिले में जिला परिषद के लिए 25 में से 9 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित थे तो ब्लाक समिति में 55 वार्डों पर महिलाओं का चुनाव हुआ।
वहीं 106 ग्राम पंचायतों की मुखिया भी महिलाएं बनी, इसके अलावा कई अन्य स्थानों पर महिलाएं प्रधान चुनी गई। साथ ही गांवों में पंच पद के लिए भी सैंकडों महिलाएं चुनी गई।
इन चुनी गई महिलाओं की शक्तियां वे खुद प्रयोग कर पाएंगी या फिर वे हर बार की तरह इस बार भी रबड स्टांप ही बनी रहेंगी।
जागरूकता की कमी: मेवात में महिला सशक्तिकरण के मामले में हालात बेहद गंभीर हैं। भले ही आज आधुनिक युग की दुहाई दी जाती हो, लेकिन यहां आज भी महिलाएं घर के चौके-चूल्हे तक ही सीमित हैं।
इसके पीछे जागरूकता व शिक्षा की कमी सबसे बडा कारण हैं। मेवात की जो महिलाएं आगे बढी है, उनके परिवार कहीं न कहीं अच्छे पढे लिखे या फिर जागरूक रहे हैं।
इनकी संया इतनी कम है कि वे एक ही ढर्रे पर चल रहे समाज को जागरूक करने में नाकाफी हैं। यहां आज भी शिक्षा के मामले में बेटियों के प्रति भारी उदासीनता देखी जाती हैं।
संसाधनों की कमी: मेवात भले ही बेटी बचाने में सबसे अव्वल हो लेकिन बेटियों को पढाने व पर्दे से बाहर निकालने में सबसे फिसड्डी हैं। जिससे सरकार की महिला सशक्तिकरण की योजना में बडी बाधा हैं।
इसके पीछे जहां लोगों की अपनी कमी जिमेदार हैं, वहीं सरकार की कथनी और करनी का अंतर भी शामिल हैं। एक तरफ सरकारें बेटियों को आगे बढाने पर जोर देती, वहीं दूसरी तरफ मेवात में इनकी शिक्षा की कोई खास व्यवस्था नहीं हैं।
हालात ये हैं कि आज भी जिला मुयालय पर कोई राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय नहीं हैं। ऐसे में पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को आगे लाने की सरकार की चुनावी योजना की पहल कितनी कारगर साबित होगी, यह भविष्य के गर्भ में छिपा हैं।