मरकज प्रशासन का दावा- एसडीएम से मांगी थी अनुमति, एक हजार लोगों के शामिल होने की दी थी जानकारी
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निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात के मरकज की वजह से राजधानी ही नहीं, पूरे देश में कोरोना का संकट बढ़ने का खतरा है। लॉकडाउन के बाद मरकज में इतनी बड़ी भीड़ जुटने पर मरकज प्रशासन ने दावा किया कि प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू से पहले 21 मार्च को ही लगभग पूरा मरकज खाली करा लिया गया था। 22 मार्च की शाम प्रधानमंत्री ने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की तो यहां से निकले जमाती रास्ते में थे। वे वहीं से मरकज लौट आए।
यहां कई राज्यों के एक हजार से ज्यादा लोगों के अलावा 100 से अधिक विदेशी भी फंस गए। मरकज प्रशासन ने दावा किया कि उसने इन लोगों को इनके घरों तक पहुंचने के लिए एसडीएम को चिट्ठी लिखकर वाहनों के पास बनाने की अनुमति मांगी। पुलिस को भी इसकी सूचना दी गई। एसडीएम की ओर से इनको निकालने का कोई इंतजाम नहीं किया गया। अब लापरवाही चाहे मरकज प्रशासन की रही हो या पुलिस और प्रशासन की, खामियाजा पूरे देश को ही भुगतना पड़ेगा।
मरकज की बंगले वाली मस्जिद के मौलाना यूसुफ ने कहा कि मरकज प्रशासन ने 23 मार्च को पुलिस अधिकारियों से जमातियों के फंसे होने के बारे में फोन पर बातचीत की थी। इसके बाद 24 मार्च को दक्षिण-पूर्व जिला पुलिस की ओर से एक चिट्ठी मरकज प्रशासन को मिली। इसमें इन लोगों को तत्काल दूसरे स्थान पर शिफ्ट करने की बात लिखी गई थी। जवाब में मरकज प्रशासन ने मौलाना यूसुफ के नाम से एसडीएम और निजामुद्दीन थाना प्रभारी को चिट्ठी लिखी थी।
पुलिस को लिखी चिट्ठी में आसपास के राज्यों के एक हजार से अधिक लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए 7 बसों की डिटेल देकर एसडीएम से उनके पास बनवाने की बात कही गई थी। चिट्ठी में यह भी लिखा गया कि एसडीएम ने इस संबंध में 25 मार्च को ही सुबह 11 बजे बैठक बुलाकर चर्चा की बात की थी। इसके बाद भी कुछ नहीं किया गया।
मरकज प्रशासन के मुताबिक, कुछ लोगों की तबीयत खराब होने की सूचना मिली तो मरकज के बाहर टेंट लगाकर उनकी जांच शुरू की गई। बाद में जो भी लोग संदिग्ध मिलने लगे, उनको अस्पताल भेजा जाने लगा। 27 मार्च से ही मरकज से लोगों को निकालकर अलग-अलग अस्पतालों में भेजा जा रहा था। जो विदेशी जमाती यहां थे, उनके दूतावासों से लगातार बातचीत चल रही थी।
अंतरराष्ट्रीय उड़ानेें बंद होने के कारण ये अपने देश भी नहीं जा सकते थे। मरकज प्रशासन का साफ कहना है कि उनकी ओर से कोई लापरवाही नहीं बरती गई है। पुलिस और सरकार को लोगों की संख्या और विदेशी जमातियों के बारे में सब कुछ पता था।
पुलिस-प्रशासन को दी थी सूचना मीडिया ने मामले को बढ़ाया
मौलाना यूसुफ, इमाम बंगले वाली मस्जिद, हजरत निजामुद्दीन ने कहा कि मीडिया ने इस पूरे मामले को बढ़ाया है। 21 मार्च को ही मरकज खाली करा लिया गया था। 22 मार्च को जो लोग रास्ते में थे, वे धीरे-धीरे मरकज में जुटते चले गए। ट्रेन 31 मार्च तक कैंसिल थीं। यहां भीड़ इकट्ठी होती गई। प्रधानमंत्री के लॉकडाउन के एलान के बाद लोग मरकज में फंस गए तो हम एसएचओ निजामुद्दीन के पास गए। एसएचओ ने जल्द से जल्द मरकज खाली कराने को कहा तो पुलिस से बसों का इंतजाम करने की मांग की गई। एसडीएम से बातचीत की गई तो उन्होंने सभी लोगों और वाहनों की लिस्ट मांगी।
यूसुफ ने कहा कि मरकज में दक्षिण भारतीय राज्यों के लोग भी मौजूद थे। एसडीएम ने कहा कि इतने सारे राज्यों में भेजने की अनुमति हम नहीं दे सकते। उनके पास फौरन कोई इंतजाम नहीं था। तब जिन लोगों को हल्का नजला, खांसी और बुखार था, उनको राजीव गांधी अस्पताल भेजा गया। इसके बाद दो सौ लोगों को दूसरे अस्पतालों में भेजा गया। इसी दौरान मीडिया को पता चल गया। हेल्थ डिपार्टमेंट ने कहा था कि हम इन लोगों के लिए यहां एक कैंप लगाकर जांच कर आगे भेजेंगे।
मौलाना यूसुफ ने कहा कि मरकज के आगे कैंप लगाकर जांच के बाद लोगों को अलग-अलग अस्पताल भेजा गया। तमिलनाडु वाले जिस साथी की मौत हुई है, वह भी एकदम ठीक था। मरकज ने अपने कदमों की जानकारी पुलिस व प्रशासन को लिखित में दी थी।
मरकज में 1000 से ज्यादा लोग फंसे हैं
अमानतुल्लाह खान, विधायक ओखला विधानसभा क्षेत्र ने कहा कि 23 मार्च की रात 12 बजे मैंने पुलिस उपायुक्त दक्षिण-पूर्व आरपी मीणा और एसीपी निजामुद्दीन को बता दिया था कि निजामुद्दीन मरकज में 1000 से ज्यादा लोग फंसे हुए हैं। फिर पुलिस ने इनको सुरक्षित भेजने का इंतजाम क्यों नहीं किया।