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हाशिमपुरा दंगा मामले में फैसला 21 मार्च को
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 21 Feb 2015 08:58 PM IST
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वर्ष 1987 के मेरठ-हाशिमपुरा दंगों के बाद 42 लोगों की पीएसी जवानों द्वारा हत्या के मामले में शनिवार को कोर्ट का फैसला एक माह के लिए टल गया। अदालत ने फैसले के लिए 21 मार्च की तारीख तय की है। मामले में पीएसी की 41 वीं बटालियन के पुलिसकर्मी आरोपी हैं।
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थाना सिविल लाइन गाजियाबाद पुलिस ने इस मामले में पीएसी के 19 अधिकारियों और कर्मियों को आरोपी बनाया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामले की सुनवाई दिल्ली ट्रांसफर हुई थी। अदालत ने अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद 21 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
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तीस हजारी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने शनिवार को केस का फैसला सुनाने के लिए 21 मार्च की तारीख तय की। यूपी सरकार के अतिरिक्त विशेष अधिवक्ता अकबर आबिदी ने छोटी तारीख देने का आग्रह किया, लेकिन अदालत ने कहा कि केस काफी पुराना है और काफी बयानों और साक्ष्यों का अध्ययन करना है, जिसके लिए समय की जरूरत है।
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अभियोजन के मुताबिक यह मामला पीएसी द्वारा हिरासत में हत्या का है। पीएसी जवानों ने पहले हाशिमपुरा इलाके से 22 मई 1987 को अगवा किया और उसके बाद रात के अंधेरे में गोलियों से भूना और शवों को गंग नहर और हिंडन नदी में फेंक दिया। इनमें से कुछ शव मिले और कुछ मिल ही नहीं पाए।
क्या है हाशिमपुरा दंगा मामला
मामला 1987 में मेरठ के हाशिमपुरा व जुम्मनपुरा के 42 की बर्बर हत्या से जुड़ा है। मामले में पीएसी के 16 अधिकारी और कर्मी आरोपी हैं। पीएसी के कंपनी कमांडर सुरेंद्र पाल सिंह समेत तीन आरोपियों की मौत हो चुकी है। अभियोजन पक्ष ने जिंदा बचे पांच पीड़ितों, मृतक के परिजनों, डॉक्टर, अन्य गवाहों और ट्रक की एफएसएल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि जवानों ने हत्या की मंशा से पीड़ितों को अगवा किया। गोलीबारी के बाद जिंदा बचे जुल्फिकार, मोहम्मद नईम, मोहम्मद उस्मान, मुजीबुर्रहमान और बाबुद्दीन के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि पीएसी ने हत्या की मंशा से एक समुदाय विशेष के लोगों को अगवा किया और गोली मारकर गंग नहर व हिंडन नदी में शवों को फेंक दिया। इनमें से पांच लोग जिंदा बच गए, जिनके बयानों के आधार पर गाजियाबाद पुलिस ने यह मामला दर्ज किया था।