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महामारी के चलते कुछ महीने और प्रदेश अध्यक्ष रह गए थे मनोज तिवारी, इन वजहों से हटाया

Tue, 02 Jun 2020 07:01 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 02 Jun 2020 07:01 PM IST
सार

  • विधानसभा चुनाव में करारी हार का ठीकरा मनोज के सिर
  • भाजपा अध्यक्ष रहने के दौरान कोई मॉडल नहीं खड़ा कर पाए

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Manoj Tiwari was left for a few months due to the pandemic and was removed due to these reasons
manoj tiwari vijay goel vijendra gupta - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

भोजपुरी गायक, सिने अभिनेता से नेता बने मनोज तिवारी के भाग्य ने भाजपा सांसद बनने के साथ शानदार पारी खेली। पूरब के जनाधार को देखते हुए वह दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए, लेकिन अपने कार्यकाल में वह कोई मॉडल नहीं खड़ा कर सके।

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार मिलने के बाद से ही माना जा रहा था कि मनोज तिवारी की कभी भी छुट्टी हो जाएगी। जेपी नड्डा के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद माना जा रहा था कि भाजपा दिल्ली का घर दुरुस्त करेगी।
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लेकिन कोविड-19 संक्रमण के खतरे को देखते हुए वह कुछ महीने पद पर रह गए। दिलचस्प बात यह है कि सोमवार को मनोज तिवारी ने दिल्ली सरकार के बार्डर को सील करने के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किया और मंगलवार को पद से हटा दिए गए।
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मनोज तिवारी पर कोविड-19 संक्रमण काल में दो बार लॉकडाउन तोड़ने का आरोप लगा। वह सोमवार को भी प्रदर्शन करते हुए गिरफ्तार किए गए थे। भाजपा के पुराने नेताओं को भी पार्टी शीर्ष नेतृत्व का मनोज तिवारी वाला प्रयोग समझ में नहीं आ रहा था।

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के ही कुछ बड़े नेताओं का कहना था कि मनोज तिवारी की पूर्वांचली मतदाताओं में अच्छी पकड़ है। दिल्ली में पूरब के  लोगों की आबादी 70 लाख से अधिक है।

इसलिए चुनाव बाद ही प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष के चेहरे पर कोई फैसला हो सकेगा। इस साल फरवरी में दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा ने इसे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा और 70 में से केवल आठ सीट पा सकी।

दिल्ली के एक भाजपा सांसद के अनुसार, अच्छा अवसर होते हुए भी भाजपा दिल्ली में सरकार विरोधी लहर पैदा करने में सफल नहीं हो पाई। समझा जा रहा है कि कुछ यही कारण मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हटाने की वजह बने।

भाजपा को एकसूत्र में नहीं बांध पाए

नवंबर 2016 में भाजपा ने दिल्ली और बिहार में प्रदेश अध्यक्ष बदला था। नित्यानंद राय को बिहार की और मनोज तिवारी को दिल्ली की जिम्मेदारी मिली थी।

मंगलवार को मणिपुर में टिकेन्द्र सिंह, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव और दिल्ली में आदेश कुमार गुप्ता को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया।

2016 से 2020 तक मनोज तिवारी के कार्यकाल में सबसे बड़ी शिकायत उनकी संगठनात्मक क्षमता को लेकर ही थी। मनोज तिवारी, भाजपा के पुराने नेता विजय गोयल, सांसद रमेश विधूड़ी समेत अन्य नेताओं के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे।

वहीं तिवारी कैंप के नेताओं का कहना है कि दिल्ली के पुराने नेता मनोज तिवारी का खुलकर सहयोग नहीं कर रहे हैं। इन सबसे इतर भाजपा में नेताओं की एक टोली और है।

इस टोली का मानना है कि मनोज तिवारी का पूरा ध्यान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष, अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर ही टिका रहता था।

तिवारी की लोकप्रियता पर कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन अधिकांश नेताओं का मानना है कि वह अपनी अभिनेता और भोजपुरी गायक की छवि से ऊपर नहीं उठ पाए।  

शीर्ष नेतृत्व में है मनोज की धाक

मनोज तिवारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों पसंद करते हैं। मनोज तिवारी ने ही कभी खुद बताया था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई प्रत्याशियों को टिकट दिलाने का आग्रह किया।

उनमें से कुछ आज सांसद हैं। गोरखपुर के सांसद रवि किशन भी मनोज तिवारी के करीबी हैं। आजमगढ़ से दिनश लाल यादव उर्फ निरहुआ को भी मनोज तिवारी के कहने पर ही भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था।



दिल्ली में प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री बीएल संतोष हैं। संतोष संगठन पर बारीक नजर रखते हैं। माना जा रहा है कि बीएल संतोष ने भी मनोज तिवारी को दूसरा कार्यकाल देने के संदर्भ में अपनी राय नहीं दी।

भाजपा के दिल्ली में छह सांसद और आठ विधायकों में भी मनोज तिवारी को चाहने वाले कम हैं। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद भी मनोज तिवारी का हश्र पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय की तरह गुमनामी वाला नहीं होगा।

तिवारी को केंद्र सरकार या केंद्रीय संगठन में कोई अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है।

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