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AAP Vs Delhi LG: मनीष सिसोदिया ने दिल्ली के उपराज्यपाल को लिखा पत्र, कहा- रोजमर्रा को कामों में दे रहे दखल

Sat, 24 Dec 2022 03:34 AM IST
आकाश दुबे अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: आकाश दुबे Updated Sat, 24 Dec 2022 03:34 AM IST
सार

पत्र में सिसोदिया ने लिखा है कि वह बेहद चिंताजनक स्थिति में पत्राचार कर रहे हैं। संबंधित मंत्री और मंत्रिमंडल को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए एलजी कार्यालय ने हाल के दिनों में विभिन्न विभागों से अधिसूचना जारी करने समेत दूसरे कई कामों को मंजूरी देने के चलन की शुरुआत की है।

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Manish Sisodia wrote a letter to Lieutenant Governor of Delhi accusing him of interfering in everyday work
उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए शुक्रवार को उपराज्यपाल वीके सक्सेना को एक पत्र लिखा है। सिसोदिया का आरोप है कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के रोजमर्रा के कामों में दखल दे रहे हैं। दिल्ली कैबिनेट की अनदेखा करते हुए उनके आदेश सीधे नौकरशाही को मिल रहे हैं। उपमुख्यमंत्री ने इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ बताया है। आरोप है कि अनुचित काम नहीं करने पर अधिकारियों को धमकी भी दी जा रही है, जबकि उपराज्यपाल संविधान की 7वीं अनुसूची और मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई ‘सहायता और सलाह’ पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं।

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उपराज्यपाल को भेजे गए पत्र में सिसोदिया ने लिखा है कि वह बेहद चिंताजनक स्थिति में पत्राचार कर रहे हैं। संबंधित मंत्री और मंत्रिमंडल को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए उपराज्यपाल कार्यालय ने हाल के दिनों में विभिन्न विभागों से अधिसूचना जारी करने समेत दूसरे कई कामों को मंजूरी देने, सचिवों व मुख्य सचिव के माध्यम से फाइलें मंगवाने के चलन की शुरुआत की है। यह सरकार के कामकाज से संबंधित स्थापित प्रथा के विपरीत होने के अलावा जीएनसीटीडी अधिनियम- 1991 द्वारा लागू मौजूदा वैधानिक व्यवस्था के अनुच्छेद 239 ए में निहित लागू सांविधानिक प्रावधानों के विपरीत है। इसके अलावा 2018 के राज्य (एनसीटी ऑफ दिल्ली) बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य से जुड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा निर्धारित कानून के भी खिलाफ है।

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संविधानिक ढांचे के उलट कार्रवाई, लोकतंत्र के विनाश के समान
सिसोदिया ने लिखा है कि जीएनसीटीडी अधिनियम साफ तौर से स्पष्ट करता है कि उपराज्यपाल को केवल ऐसे मामलों में स्वनिर्णय का अधिकार है जो विधानसभा को दी हुई शक्तियों के दायरे से बाहर है। और जिसे लेकर उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा शक्तियां या कार्य सौंपे गए हैं। इसके अलावा उन मामलों में जहां उन्हें किसी कानून के तहत या इस तरह के स्वनिर्णय का प्रयोग करने की आवश्यकता है। इसके अलावा सांविधानिक प्रावधान भी कैबिनेट की सलाह पर काम करने का प्रावधान करते हैं। अगर सांविधानिक ढांचे के उलट कार्रवाई होती है तो यह लोकतंत्र के विनाश के समान होगा।

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सहायता और सलाह’ पर कार्य करने के लिए बाध्य
पत्र में सिसोदिया ने कहा है कि टीबीआर, 1993 का नियम 19(5) माननीय उपराज्यपाल को किसी भी विभाग में किसी भी प्रस्ताव या मामले से संबंधित कागजात मंगवाने का अधिकार देता है। हालांकि, पहले से उल्लेखित कानूनी और संविधानिक स्थिति के मद्देनजर उपराज्यपाल किसी भी मामले के संबंध में किसी भी स्वतंत्र निर्णय लेने वाले प्राधिकरण के साथ निहित नहीं हैं, अर्थात ‘हस्तांतरित विषयों’ से संबंधित हैं। वह संविधान की 7वीं अनुसूची और मंत्रिपरिषद द्वारा उन्हें दी गई ‘सहायता और सलाह’ पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। उपमुख्यमंत्री ने गुजारिश की है कि उपराज्यपाल के हालिया कार्य, मंत्रिपरिषद को दरकिनार कर स्थानांतरित विषयों पर अधिकारियों को सीधे आदेश देना, सर्वोच्च न्यायालय के कानून और आदेशों के विपरीत है। उपमुख्यमंत्री ने कहा है कि उपराज्यपाल इस पर पुनर्विचार करें। इससे विवादों से बचा जा सकेगा।

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