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धीर के AAP छोड़ने की 'वो' नहीं, 'ये' है असली वजह

Sat, 22 Nov 2014 07:50 AM IST
Updated Sat, 22 Nov 2014 07:50 AM IST
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main reason MS Dhir leaving aap.

दिल्ली की विधानसभा भंग है लेकिन पूर्व विस अध्यक्ष एमएस धीर अपने पद पर अगले चुनाव तक बने रहेंगे। विस अध्यक्ष को पार्टी से हटकर देखा जाता है, उसके लिए कुछ मर्यादाएं और नियम बने हैं।

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विस अध्यक्ष रहते हुए उन्हें संबंधित पार्टी के कार्यक्रम, मुख्यमंत्री या मंत्री कार्यालय में नहीं जाना चाहिए। विस के लिए बने नियमों को तोड़कर खुद से संबंधित पार्टी की हेल्प नहीं कर सकते। इन्हीं गरिमा और पाबंदी के कारण एमएस धीर का अरविंद केजरीवाल के साथ गणित बिगड़ गया।
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सूत्र बताते हैं कि केजरीवाल की 49 दिन की सरकार का सबसे बड़ा वादा जनलोकपाल बिल पास कराना था। लेकिन बिल तैयार नहीं था और केजरीवाल उसे कार्यवाही की सूची में शामिल कराना चाहते थे।
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कई बार इसके लिए जोर भी दिया गया। जब बिल पेश हुआ तब भी बिल देर रात विस को सौंपा गया। इतना ही नहीं बतौर मुख्यमंत्री और पार्टी का हाईकमान होने के नाते अरविंद विस अध्यक्ष को अपने कार्यालय व पार्टी के कार्यक्रमों में बुलाना चाहते थे।

लेकिन विस अध्यक्ष ने ऐसा करने से मना कर दिया था। इतना ही नहीं जब पहले दिन ‘आप’ के विधायक टोपी पहनकर आए तो टोपी उतारने और अगली बैठक में पहनकर नहीं आने की व्यवस्था दे दी थी।

दिल्ली विस के पूर्व सचिव एसके शर्मा का इस संबंध में कहना है कि विस अध्यक्ष रहते हुए संबंधित पार्टी के कार्यक्रम में शामिल नहीं होना चाहिए। न ही मुख्यमंत्री या मंत्री के कार्यालय में जाना चाहिए। हालांकि विस अध्यक्ष मुख्यमंत्री या मंत्री के घर पर जा सकते हैं।

...दूसरी पार्टी के दिग्गज की एंट्री से न हो जाए नुकसान

main reason MS Dhir leaving aap.

विस चुनाव की घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक दलों में नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया है। कहीं दूसरी पार्टी के दिग्गज को अपनी पार्टी में शामिल कराने का नुकसान न हो जाए। राजनीतिक विशेषज्ञ इसकी आशंका जता रहे हैं। उनका कहना है कि जब किसी सीट पर दूसरी पार्टी के बड़े नेता को लाते हैं तो आपकी पार्टी के वर्तमान स्थानीय नेता व उनसे जुड़े कार्यकर्ता नाराज हो जाते हैं।

विस चुनाव 2013 में भाजपा के दिग्गज नेता हरिशरण सिंह बल्ली को भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो कांग्रेस ने हाथ थमा दिया। हरिनगर से टिकट भी दिया लेकिन ‘आप’ के जीत दर्ज करने वाले विधायक जगदीप सिंह से करीब 16 हजार वोट से पीछे रह गए। कृष्णा नगर में कांग्रेस ने भाजपा के नेता डॉ. वीके मोंगा को पार्टी में शामिल कराकर टिकट दिया।

यहां भी डॉ. मोंगा को सिर्फ 26 हजार वोट मिले जबकि भाजपा के डॉ. हर्षवर्धन को 69 हजार वोट मिले। इसमें रामबीर सिंह बिधूड़ी को अपवाद कहा जा सकता है जिन्होंने एनसीपी छोड़कर भाजपा से चुनाव लड़ा और जीत भी गए।

इस बार कांग्रेस का हाथ मटिया महल से विधायक शोएब इकबाल ने थामा है। यहां से 2013 के चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी जावेद मिर्जा करीब 20 हजार वोट लेकर दूसरे नंबर पर थे। इस बार भी टिकट की कोशिश में थे, अब शोएब को मौका मिलने पर प्रतिक्रिया देखनी होगी।

इसी तरह से जंगपुरा में एमएस धीर ने भाजपा का फूल थामा है। यहां भाजपा प्रत्याशी पंकज जैन बेशक तीसरे नंबर पर थे लेकिन 19 हजार वोट मिले थे। फिर टिकट की तैयारी में थे, एमएस धीर को भाजपा मौका देती है तो भितरघात से इनकार नहीं किया जा सकता।

तिमारपुर से ‘आप’ के विधायक डॉ. हरीश खन्ना और रोहिणी से राजेश गर्ग चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। ऐसे में ‘आप’ के लिए यहां जीत आसान नहीं होगी।

तिमारपुर में भाजपा प्रत्याशी रजनी अब्बी 3383 वोट से पीछे थीं तो रोहिणी में भाजपा प्रत्याशी जयभगवान अग्रवाल महज 1878 वोट से चुनाव हारे थे। इन दोनो सीट पर भाजपा की तरफ झुकाव वाले इन ‘आप’ नेताओं को शामिल कराती है तो भितरघात से इनकार नहीं किया जा सकता।

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