महामेधा बैंक घोटालाः जिनकी हैसियत 50 लाख भी नहीं थी, उन्हें दे दिया 10 करोड़ तक का कर्ज
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महामेधा अर्बन कॉपरेटिव बैंक लिमिटेड ने खाताधारकों की 100 करोड़ 47 लाख की जमा पूंजी अपने चहेते बिल्डर, कारोबारी और कुछ कंपनियों को लोन देने में लुटा दी। रिजर्व बैंक की गाइडलाइन का उल्लंघन कर बिना हैसियत देखे लोन स्वीकृति किए गए। जिनकी कुल हैसियत 50 लाख रुपये भी नहीं थी, उन्हें 5 से 10 करोड़ का लोन दे दिया गया।
बैंक को चेक डिस्काउंटिंग लोन दो लाख रुपये तक का देने का अधिकार था लेकिन करोड़ों रुपये के लोन चेक पर पास कर दिए। इन सभी का नतीजा है कि 37588 खाताधारकों की बड़ी रकम डूब गई। इनमें से 1452 लोगों की धनराशि वापस मिलने की अभी दूर-दूर तक कोई संभावना दिखाई नहीं देती है। हालांकि ऑडिट के बाद नौ लोगों की संपत्ति अटैच कर ली गई है।
खाताधारक की 100.48 करोड़ की धनराशि बैंक की छह शाखाओं के माध्यम से जमा की गई थी। इसमें से बैंक ने 37 करोड़ रुपये का लोन ऐसे लोगों को दे दिया जो डिफाल्टर की श्रेणी में हैं और उनसे रकम वापसी की कोई उम्मीद नहीं है। मौजूदा वक्त में लोन बढ़कर करीब 50 करोड़ रुपये के पार हो गया है लेकिन कहीं से रिकवरी के आसार नहीं दिखते हैं। ऑडिट से पता चलता है कि अच्छी साख रखने वाले खाताधारकों को भी बैंक ने चूना लगाया।
उनकी तरफ से ब्याज समेत लोन की धनराशि लौटा दी गई लेकिन मास्टर रोल में लोन बरकरार रखा गया और उनकी तरफ से जमा धनराशि को दूसरे लोगों को लोन के रूप में बांट दिया। इस तरह से करोड़ों का लोन बैंक से बाहर ही चलता रहा। सरकार की तरफ से नोटिस जारी होने पर पता चला कि उनकी तरफ से लोन की समस्त धनराशि जमा करा दी गई।
128 लोगों पर मेहरबान हुआ बैंक प्रबंधन
बैंक की गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर और हापुड़ को मिलाकर छह शाखाएं थीं। इनमें से गाजियाबाद में संजयनगर और नई बस्ती व गौतमबुद्धनगर में दादरी, सूरजपुर तथा सेक्टर-59 में एक-एक शाखा संचालित थी, जिसका संचालन रिजर्व बैंक से लाइसेंस निरस्त होने के बाद अगस्त 2017 के बाद बंद कर दिया गया। ऑडिट से पता चला कि बैंक ने 128 लोगों को उनकी हैसियत (क्रेडिट वेल्यू) से अधिक का लोन दिया। इनमें बिल्डर, ठेकेदार, व्यापारी और कई निजी कंपनियां भी शामिल हैं। लोन देते वक्त उनसे कोई ठोस गारंटी भी जमा नहीं की गई। बल्कि साधारण पत्रों के आधार पर लोन दे दिया था।
बैंक संचालक बिल्डरों के साथ पार्टनर
कई बिल्डरों के साथ बैंक संचालकों की पार्टनरशिप भी है। ऑडिट के दौरान उसके कुछ शुरूआती साक्ष्य मिले हैं। सहकारिता विभाग को आशंका है कि बैंक प्रमोटर्स (संचालकों) ने जनता की जमा पूंजी को फर्जी तरीके से लोन स्वीकृति करके अपने दूसरे कारोबार में लगाया। इसलिए अब सरकार चाहती है कि मामले की अलग से जांच हो। इसे लेकर भी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
1452 लोगों को नहीं लौट पाएगा पूरा पैसा
ऑडिट से पता चला है कि 37588 खाताधारकों में 1452 ऐसे हैं जिनकी जमा-पूंजी एक लाख से ऊपर की है। अब उस वक्त की बैंक जमा गारंटी (बीमा) की शर्तों के हिसाब से एक लाख तक का जमा ही लौटाया जा सकता है। इसमें से करीब डेढ़ हजार लोगों की जमा धनराशि लौटा दी गई है। अब असली संकट 1452 खाताधारकों के सामने हैं, जिनकी जमा पूंजी करीब 37 करोड़ रुपये है। अगर ब्याज सहित इस धनराशि को जोड़ा जाए तो यह करीब 50 करोड़ के आसपास बैठती है। सरकार के सामने चुनौती उसी को लौटाने की है।
नौ लोगों की संपत्ति अटैच
ऑडिट शुरू करने के साथ ही अब सरकार के निर्देश पर सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक सहकारिता की तरफ से बैंक संचालकों की संपत्ति अटैच करने का काम शुरू कर दिया है। अब तक नौ लोगों की संपत्ति अटैच की जा चुकी है। इसमें अशोक नगर, राजनगर और संजयनगर की संपत्तियां शामिल हैं, जिनकी कीमत करीब 15 से 20 करोड़ आंकी जा रही है।
71 लोनधारकों को भी सरकार का नोटिस
बैंक द्वारा दिए गए लोन की रिकवरी को लेकर 71 लोगों को नोटिस जारी किया गया। मामले में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद अब सहकारिता विभाग की कोशिश बैंक से लोन हासिल करने वाले लोगों पर भी नकेल कसने की है। सभी को डिफाल्टर की श्रेणी में डालकर जल्द ही उनकी संपत्ति को अटैच किया जाना है लेकिन विभागीय अधिकारियों का कहना है कि असल दिक्कत इस बात की है कि उनकी कुल संपत्ति ही पांच-सात करोड़ रुपये के आसपास की है। हालांकि अभी विभाग की ओर से आंतरिक सर्वे जारी है।