अमर उजाला पड़ताल: इनहेलर की कम जानकारी अस्थमा मरीजों को दे सकती है अटैक
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दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-एक निवासी महेश राजपूत लंबे समय से अस्थमा रोगी हैं। वे राजधानी के ही एक निजी अस्पताल के एचआर विभाग में तैनात हैं, लेकिन विडंबना है कि होली वाले दिन 21 मार्च को अस्थमा अटैक आने के कारण उन्हें इमरजेंसी में भर्ती होना पड़ा। परिजनों का कहना है कि महेश पिछले पांच वर्ष से अस्थमा का उपचार ले रहे हैं। बावजूद इसके अचानक अटैक आने के पीछे कारण समझ नहीं आ रहा। महेश की स्थिति और परिजनों के चौंकाने वाले इन सवालों पर जब पड़ताल की गई तो पता चला कि दिल्ली के ज्यादातर अस्पतालों में महेश जैसे कई मरीज रोजाना पहुंच रहे हैं।
भले ही ये मरीज कई साल से उपचार ले रहे हों, लेकिन उन्हें इनहेलर (जिसके जरिए दवा ले रहे थे) का सही इस्तेमाल करने का ही नहीं पता होता। इसका असर ये होता है कि इनके शरीर में पर्याप्त दवा न पहुंचने से उपचार में अवरोध खड़ा हो जाता है। सर गंगाराम, बीएलके, मैक्स, फोर्टिस, अपोलो अस्पताल के अलावा एम्स, सफदरजंग, आरएमएल, लोकनायक, राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल ताहिरपुर और जीटीबी में आए दिन ऐसे मामले आ रहे हैं।
क्या है अस्थमा
जीटीबी अस्पताल के डॉ. विनोद ने बताया कि अस्थमा वायुमार्ग (जिसे ब्रोंकाई कहा जाता है) में सूजन के कारण होने वाला एक विकार है, जो फेफड़ों तक पहुंचता है। सूजन के कारण वायुमार्ग तंग और संकीर्ण हो जाते हैं, जो हवा को फेफड़ों में स्वतंत्र रूप से बहने से रोकता है, जिससे सांस लेने में मुश्किल होती है। अस्थमा और सीओपीडी यानि काला दमा के रोग को लेकर अक्सर मरीजों को पर्याप्त जानकारी न होने की चिंता सताती है। बीएलके अस्पताल के डॉ. संदीप नैय्यर के अनुसार, ज्यादातर मरीजों को इनहेलर के सही इस्तेमाल के बारे में पता नहीं होता। चिकित्सीय विद्यार्थी और नर्स के अलावा कई डॉक्टर भी इस्तेमाल के बारे में नहीं जानते हैं।
अध्ययन में सामने आई सच्चाई, अस्थमा प्रबंधन कमजोर
सितंबर 2015 में जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया में एम्स सहित देश के सात विशेषज्ञों का अध्ययन एपी-एआईएम प्रकाशित हुआ था। इसके अनुसार अस्थमा प्रबंधन की भारत में स्थिति बेहद कमजोर है। अध्ययन में अजमेर, दिल्ली, कोलकाता, राउरकेला, मुंबई, चेन्नई, राजकोट में फरवरी से जुलाई के बीच मरीजों से सवाल जवाब किए गए थे। अध्ययन में एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया शामिल थे। एम्स में आने वाले अस्थमा रोगियों से बातचीत के बाद अस्थमा रोग होने के बाद बरती जाने वाली सतर्कता के बारे में जानकारी बहुत कम देखने को मिली।
उत्तर भारत में स्थिति और गंभीर
2017 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिसर्च इन मेडिकल साइंसेज में प्रकाशित राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के अध्ययन में दिल्ली, यूपी, बिहार, हरियाणा, पंजाब सहित पूरे उत्तर भारत के अस्थमा और सीओपीडी मरीजों की गंभीर स्थिति बताई है। वरिष्ठ डॉ. मंदीप कुमार सोंधी के अनुसार 200 मरीजों पर किए गए इस अध्ययन में सामने आया कि 86 फीसदी मरीजों को इनहेलर के इस्तेमाल के बारे में नहीं पता। ठीक इसी तरह के अध्ययन हाल ही में ऑस्ट्रेलिया और यूके में भी हुए हैं। उन देशों में भी अस्थमा और सीओपीडी के रोगियों के हालात ऐसे ही हैं।
ये है देश की स्थिति
- हर 10 में से 1 अस्थमा मरीज भारत में
- 2 करोड़ के आसपास हैं देश में अस्थमा मरीज
- 2 करोड़ में 50 फीसदी अस्थमा मरीज बच्चे।
- 1.83 लाख से ज्यादा मरीजों की हर साल हो रही मौत।
- 90 फीसदी बच्चों और 50 फीसदी बड़ों में अस्थमा प्रदूषण से जुड़ा
- भारत में होने वाली मौतों में 12वां कारण है दमा यानि अस्थमा।