फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   leopard attack in guraon

गांवों का रुख करते ही बढ़ जाता है वन्य जीवों पर खतरा 

Wed, 27 Apr 2016 12:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव Updated Wed, 27 Apr 2016 12:37 PM IST
सार

  • यहां हर साल एक-दो बार जरूर दिखता है तेंदुआ
  • अतिक्रमण की वजह से गांवों और शहर की ओर रुख करने को मजबूर हैं तेंदुए

विज्ञापन
leopard attack in guraon
तेंदुआ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अरावली पहाड़ी क्षेत्र में वन्य जीवों पर खतरा मंडरा रहा है। अतिक्रमण का सिलसिला लगातार जारी है। इससे वन्य जीव अशांत हो रहे हैं। इलाके में भोजन एवं पानी का संकट भी तेजी से बढ़ रहा है।

विज्ञापन


इस वजह से भी वन्य जीव गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। साठ के दशक तक अरावली पहाड़ी क्षेत्र में काफी संख्या में तेंदुआ रहते थे। लोगों की हिम्मत नहीं होती थी कि वे इस पहाड़ी इलाके में प्रवेश कर सकें।
विज्ञापन



मारुति उद्योग के आने के बाद विकास की ऐसी आंधी चली कि देखते ही देखते अरावली पहाड़ी क्षेत्र में भी अतिक्रमण का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ वर्ष पहले वन विभाग गुडग़ांव के तत्कालीन वन संरक्षक डॉ. आरपी बालवान ने सुप्रीम कोर्ट सौंपी रिपोर्ट में चार हजार एकड़ से अधिक भूमि पर गैर वानिकी कार्य होने की बात कही थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने हजार एकड़ भूमि पर गैर वानिकी कार्य हो सकते हैं। इस वजह से धीरे-धीरे वन्य जीव कम होने शुरू हो गए। जहां पहले पूरे क्षेत्र में वन्य जीव दिखाई देते थे, वहीं अब केवल उन्हीं इलाकों में वन्य जीव हैं, जहां अधिक हरियाली है। 

मांगर, रायसीना जोन के मानेसर इलाकों में काफी घनी हरियाली है। इस वजह से अधिकतर वन्य जीव इन्हीं इलाकों में रहते हैं। ये अब भोजन की तलाश में निकलने के दौरान कई बार भटक जाते हैं। जैसे ही सड़क पार करने की कोशिश करते हैं, मौत के शिकार हो जाते हैं।

इलाके में न भोजन है और न ही पानी
अरावली पहाड़ी इलाके में चारों तरफ  मस्कट के पेड़ हैं। यही वजह है कि जब भी बंदरों या पालतू जानवरों को क्षेत्र में छोड़ा जाता है, वे भागकर फिर से रिहायशी इलाकों में चले जाते हैं। अस्सी के दशक तक इलाके में फलदार पेड़ भी थे।

इस वजह से पालतू जानवर भी रिहायशी इलाकों से भागकर अरावली के इलाके में पहुंच जाते हैं। अब स्थिति यह है कि वन्य जीव कई बार भोजन व पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों में भागकर चले आते हैं।

भागने के दौरान कई बार वे पत्थरों से टकरा जाते हैं तो कई बार लोगों की पकड़ में आ जाते हैं। कुछ महीने पहले मानेसर के नजदीक स्थित एक तेंदुआ घायल मिला था। इससे पहले  गोल्फ कोर्स में एक तेंदुआ मृत मिला था। कुछ ही दिन बाद तीन तेंदुए और मृत मिले थे। मामला पर्यावरण कोर्ट में है। 

अब तक नहीं बन सका चेक डैम
अरावली के क्षेत्र में वन्य जीवों के लिए कई वर्षो से क्षेत्र में चेक डैम बनाने की बात चल रही है, लेकिन प्रदेश सरकार ध्यान देने को तैयार नहीं। चेक डैम बनने से जगह-जगह पानी जमा होता। पानी धीरे-धीरे नीचे जाता।

इससे जहां भूमिगत जल स्तर में सुधार होता, वहीं आसपास हरियाली बढ़ती। पर्यावरणविद् चेतन अग्रवाल कहते हैं कि भोजन से अधिक प्यास बुझाने के लिए तेंदुए या अन्य वन्य जीव रिहायशी इलाकों में भागते हैं। जिसकी वजह से यह इन इलाकों में दिखने लगे हैं।

कब-कब दिखा तेंदुआ
-13 जनवरी, 2015: सोहना के दमदमा इलाके में दिखा था तेंदुआ और शावक
-08 मई 2015: मांगर के पास सड़क पर तेंदुआ दिखा
-06 अगस्त, 2015: मानेसर के पास अरावली में तेंदुआ दिखने से मचा था हड़कंप
-जनवरी 2016 में गैरतपुर बास से सटे जंगलों में पेड़ से बंधा मिला था शावक।

नगीना के 68 गांवों में से सिर्फ 5 जोहड़ों में पानी

leopard attack in guraon
सूखा - फोटो : राजुद्दीन जंग

कई बड़ी योजनाओं के बावजूद भी नगीना क्षेत्र के गांवों के जोहड़ों में पानी न होने के चलते बेजुबान मवेशियों की प्यास नहीं बुझ पा रही। आलम ये है कि खंड के 68 गांवों में केवल रीठट, मूलथान, उमरी, हुहुका, खानमोहमदपुर के जोहड़ों में थोड़ा पानी बचा है।

जबकि भादस, बसईखानजादा, नाईनंगला के जोहड़ कई महीने पहले सूख चुके हैं। अप्रैल माह में तेज गर्मी के चलते इन तालाबों में बचा हुआ पानी भी सूख गया।

इस बात का खुलासा तहसील की तरफ से पटवारियों द्वारा की गई सर्वे रिपोर्ट में हुआ है। कस्बा नगीना, रानीका, बसईखानजादा, नाईनंगला, मूलथान, भादस ऐसे गांव हैं जिनमें ग्रामीण जोहड़ों में पानी के लिए उच्चाधिकारियों से दर्जनों बार मिल चुके हैं।

ग्रामीणों ने अपने स्तर पर कुछ नालों की सफाई भी करी ताकि पानी नाले के आखिरी छोर  तक पहुंचे। जिला प्रशासन ने भी बनारसी रजवाहा और आकेड़ा-भादस नाले की सफाई कराई। हाजी नत्थूखां (90) ने बताया कि बैशाख के महीने में कभी हमने जोहड़ सूखे नहीं देखे।

ऐसा कम बरसात की वजह से हुआ है। चौधरी सोहराब खां (70) ने बताया कि सन 1977 और 1996 में मूसलाधार बारिस कई दिनों तक हुई थी। तो तमाम तालाबों में पानी ऊपरी किनार तक आ गया था।

कई तालाबों की मेंढ़ भी टूट गई थी। चौधरी दियाला (67) का कहना है कि प्रत्येक साल तालाबों को सूखने से पहले ही सरकार की तरफ से भर दिया जाता है। किंतु वर्तमान सरकार ने लापरवाही दिखाई है। केवल आश्वासन मिल रहे हैं कार्रवाई नहीं हो रही।

दूसरी तरफ, अपनी भैंसों, गायों, बैलों, बकरियों, भेड़ों, ऊंटों और कटड़ों को पानी उपलब्ध कराने के लिए अधिकारियों के चक्कर लगा चुके ग्रामीण परेशान हैं।

उप तहसीलदार जगदीशचन्द्र ने बताया कि नगीना क्षेत्र के आधा दर्जन गांवों के तालाबों में ही थोड़ा बहुत पानी बचा है, खंड के सभी जोहड़ सूख गए हैं। इन्हें भरने के लिए रिपोर्ट जिला प्रशासन को भेजी गयी है। इस बारे में 28 अप्रैल को जिला स्तर पर बैठक भी होनी है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed