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किडनी कांड: सख्त नियमों के बाद भी चल रहा किडनी का गोरखधंधा
Thu, 28 Feb 2019 02:04 AM IST
Priyesh Mishra
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
Published by: Priyesh Mishra
Updated Thu, 28 Feb 2019 02:04 AM IST
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kidney problem
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देश में मानव अंगों को लेकर सख्त नियम होने के बाद भी आए दिन किडनी के गोरखधंधे सामने आते हैं। भारत सरकार अंग प्रत्यारोपण को लेकर कठोर नियम बना चुका है, लेकिन फिर भी किडनी बाजार सरेआम चलता रहता है। कभी दिल्ली तो कभी मुंबई। इस पर दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के एंटी क्वैक्री सेल के चेयरमेन डॉ. अनिल बंसल का कहना है कि किडनी का रैकेट देश में नया नहीं है। हर एक या दो साल में किसी न किसी राज्य में इस तरह का गिरोह चलाने वाले पकड़े जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये पूरा खेल सख्त नियमों की आड़ में ही चलता है।
उन्होंने बताया कि जब एक मरीज को किडनी की जरूरत होती है तो उसके लिए किसी रिश्तेदार या परिवार के सदस्य से ही किडनी ली जा सकती है। इसकी जांच के लिए हर अस्पताल में एक बोर्ड होता है, जो वीडियोग्राफी भी करता है। बोर्ड के सामने किडनी देने वाला और लेने वाला दोनों ही पेश होते हैं। इस दौरान तमाम दस्तावेज और रिश्ता देखा जाता है। यहां गौर करने वाली बात है कि चूंकि बोर्ड में सभी सदस्य डॉक्टर या अधिकारी होते हैं, जिनके पास दस्तावेज के सही सत्यापन की तकनीक नहीं होती।
ये पूरा खेल बोर्ड के सामने पेश होने से पहले ही पूरा हो चुका होता है। गिरोह सबसे पहले ग्राहक तलाशता है, जिसे किडनी की जरूरत होती है। इससे लाखों की डील होने के बाद फिर किसी गरीब या जरूरतमंद को पकड़ते हैं। उसके नकली दस्तावेज बनाते हैं और नकली फोटो भी। ताकि किडनी लेने वाले से उसकी रिश्तेदारी को साबित किया जा सके।
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चूंकि आजकल तकनीक इतनी हावी है कि नकली फोटो या दस्तावेज की पहचान करना आसान नहीं होता। इसीलिए बड़ी ही आसानी के साथ रैकेट अपना गोरखधंधा चला लेता है। अगर इस प्रक्रिया को ओपन यानि खुला कर दिया जाए तो शायद किडनी लेने वाला मरीज आसानी से किसी भी दाता को ला सकता है।
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उन्होंने बताया कि जब एक मरीज को किडनी की जरूरत होती है तो उसके लिए किसी रिश्तेदार या परिवार के सदस्य से ही किडनी ली जा सकती है। इसकी जांच के लिए हर अस्पताल में एक बोर्ड होता है, जो वीडियोग्राफी भी करता है। बोर्ड के सामने किडनी देने वाला और लेने वाला दोनों ही पेश होते हैं। इस दौरान तमाम दस्तावेज और रिश्ता देखा जाता है। यहां गौर करने वाली बात है कि चूंकि बोर्ड में सभी सदस्य डॉक्टर या अधिकारी होते हैं, जिनके पास दस्तावेज के सही सत्यापन की तकनीक नहीं होती।
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ये पूरा खेल बोर्ड के सामने पेश होने से पहले ही पूरा हो चुका होता है। गिरोह सबसे पहले ग्राहक तलाशता है, जिसे किडनी की जरूरत होती है। इससे लाखों की डील होने के बाद फिर किसी गरीब या जरूरतमंद को पकड़ते हैं। उसके नकली दस्तावेज बनाते हैं और नकली फोटो भी। ताकि किडनी लेने वाले से उसकी रिश्तेदारी को साबित किया जा सके।
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चूंकि आजकल तकनीक इतनी हावी है कि नकली फोटो या दस्तावेज की पहचान करना आसान नहीं होता। इसीलिए बड़ी ही आसानी के साथ रैकेट अपना गोरखधंधा चला लेता है। अगर इस प्रक्रिया को ओपन यानि खुला कर दिया जाए तो शायद किडनी लेने वाला मरीज आसानी से किसी भी दाता को ला सकता है।
सरकारी अस्पतालों में कुछ ही होते हैं प्रत्यारोपण
डॉ. बंसल के अनुसार सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और किडनी की उपलब्धता न होने के कारण कम ही प्रत्यारोपण हो पाते हैं। इस पर जब राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) के आंकड़ों की तफ्तीश की गई तो पता चला कि पिछले 23 साल में दिल्ली में 15 हजार 71 किडनी प्रत्यारोपण हुए हैं। इसमें से महज 17.5 फीसदी यानी 2650 सरकारी और 12 हजार 421 प्रत्यारोपण निजी अस्पतालों में हुए हैं। गौर करने वाली बात है कि सरकारी अस्पतालों में से अकेले एम्स ने ही इन 23 वर्षों में 2260 प्रत्यारोपण किए हैं। यानि केवल 390 प्रत्यारोपण दिल्ली के बाकी सरकारी अस्पतालों में हुए हैं। यही वजह है कि इस पूरे खेल में निजी अस्पताल में मौजूद कर्मचारी गिरोह में शामिल होता है।
केवल किडनी में ही सक्रिय गिरोह
दिल्ली में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ काम करने वाले डॉ. बंसल का कहना है कि मानव अंगों की बात करें तो केवल किडनी में ही गिरोह सक्रिय रहता है, क्योंकि दिल प्रत्यारोपण के लिए ब्रेन डेड और लिवर प्रत्यारोपण के लिए दाता की उपलब्धता आसान होती है। पेनक्रियाज, त्वचा, हाथ या पैर में भी दिक्कत नहीं होती। इसलिए उनका मानना है कि देश में रक्तदान की तरह किडनी दान को लेकर भी शिविर लगने चाहिए।
केवल किडनी में ही सक्रिय गिरोह
दिल्ली में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ काम करने वाले डॉ. बंसल का कहना है कि मानव अंगों की बात करें तो केवल किडनी में ही गिरोह सक्रिय रहता है, क्योंकि दिल प्रत्यारोपण के लिए ब्रेन डेड और लिवर प्रत्यारोपण के लिए दाता की उपलब्धता आसान होती है। पेनक्रियाज, त्वचा, हाथ या पैर में भी दिक्कत नहीं होती। इसलिए उनका मानना है कि देश में रक्तदान की तरह किडनी दान को लेकर भी शिविर लगने चाहिए।