जेटली के बहाने लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं केजरीवाल
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अरविंद केजरीवाल ने विरोध की राजनीति की है. उन्हें हमेशा विरोध की राजनीति करनी होती है. वह हमेशा सही मुद्दा तलाशते हैं। वह अच्छी तरह समझते हैं कि किसी मुद्दे को उठाने का सही समय कौन सा है।
जब डीडीसीए की सियासत को लेकर अरुण जेटली पर सवाल उठ रहे थे और उन पर बोलने को कोई तैयार नहीं था, तब उन्होंने केंद्र सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले अरुण जेटली पर हमला बोला है।
माना जाता है कि अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री से जो शिकायतें हैं, उनके पीछे अरुण जेटली का ही हाथ है। अरविंद केजरीवाल की हमेशा से कोशिश रही है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चेहरा बनते दिखाई दें।
इसलिए वह नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाराणसी गए थे। वहीं दिल्ली के विधानसभा चुनाव में 70 में से 67 जीतने के बाद केजरीवाल के हौसले बुलंद हो गए और उन्होंने प्रधानमंत्री पर हमले तेज कर दिए।
दिल्ली विधानसभा को बनाया आधार
अब उन्होंने 2019 और 2024 के चुनाव का प्लेटफ़ॉर्म तैयार करना शुरू कर दिया है। उनके लिए पहले दिल्ली का जंतर-मंतर अड्डा हुआ करता था, अब उसकी जगह दिल्ली विधानसभा ने ले ली है।
भारतीय जनता पार्टी में एक दूसरे के प्रति मीडिया में खबरें प्लांट करवाना कोई नई बात नहीं है। यह काम पिछले कुछ समय से रुका हुआ था। अब यह फिर शुरू हो गया है।
भाजपा सांसद कीर्ति आजाद ने जो आरोप लगाए हैं, वो नए नहीं है। उनकी जांच भी हो चुकी है। अरुण जेटली एसएफआईओ की जांच रिपोर्ट को अपने पक्ष में बताते हैं।
उनका कहना है कि एसएफआईओ की जांच में उन्हें बेदाग साबित किया गया है। लेकिन इन सवालों का कोई जवाब नहीं कि डीडीसीए में बिलों का जो फर्जीवाड़ा हुआ है, उसका कोई जवाब नहीं है।
डीडीसीए में आजाद को बनाया मोहरा
कीर्ति आजाद के रूप में अरविंद केजरीवाल और विपक्ष को एक मोहरा मिला। केजरीवाल ने इसे सुर दिए। केजरीवाल से ठीक पहले दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने भी यही आरोप लगाए थे।
लेकिन केजरीवाल की टीम जब इसे सामने लेकर आई तो यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर उछला। अब तक माना जाता रहा है कि अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया जा सकता। लेकिन इस बार उन पर आरोप लगे हैं, जिसे लेकर वह अदालत गए हैं। अब दिलचस्प सवाल यह है कि इस सवाल को भारतीय जनता पार्टी में किस तरह लिया जाता है।
सुषमा स्वराज पर जब आईपीएल गेट का आरोप लगा तो उनके बचाव में राजनाथ सिंह से लेकर अमित शाह तक बचाव में आ गए। लेकिन अरुण जेटली के मामले में पहले पार्टी को अपने प्रवक्ताओं को बचाव में उतारना पड़ा। उसके बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी उनके बचाव में आगे आईं। अब प्रधानमंत्री जिस तरह से अरुण जेटली के बचाव में आए हैं, हो सकता है कि उन्होंने सदिच्छा में ही कहा हो कि लालकृष्ण आडवाणी पर हवाला के आरोप लगे और वो बेदाग होकर निकले।
हालांकि तथ्य यह है कि आरोप लगने के बाद आडवाणी ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया और जांच में बेदाग साबित होने के बाद वे मंत्री बने। अगर यह साफ तौर पर संदेश है तो प्रधानमंत्री के बयान के मायने को समझना चाहिए।