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26 साल बाद भी नहीं बदली कश्मीरी पंडितों की हालत
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Sun, 14 Feb 2016 05:47 PM IST
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मशहूर गायक किशोर कुमार के गीत ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन’ कश्मीरी पंडितों के लिए किसी दर्द से कम नहीं हैं। जिन्हें 26 साल पहले घर से बेघर होना पड़ा। सरकारें बदलती रहीं, एक के बाद एक चेहरे उम्मीद जगाते रहे।
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सब कुछ होने के बाद भी आंखों में उम्मीद के सपने लिए इन कश्मीरी पंडितों की घर वापसी नहीं हो सकी। शहर की अलग अलग कॉलोनियों में 1500 से ज्यादा परिवार अपने ही मुल्क में प्रवासी या शरणार्थी बन कर जी रहे हैं। पेश है कश्मीरी पंडितों का दर्द बयां करती मुकेश शर्मा की रिपोर्ट:-
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सेक्टर तीन में बंसीलाल और कृष्णा कौल अपने परिवार के साथ रैनाबारी में रहते थे। चार मंजिला मकान के पास दूसरे मकानों में कई मुस्लिम परिवार थे। अच्छे संबंध थे, लेकिन 1990 में चरमपंथियों ने ऐसा तनाव पैदा किया कि पड़ोसी भी उनके दुश्मन हो गए।
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बड़े भाई मोतीलाल कौल को गोली मारकर हत्या करने का प्रयास किया। लेकिन वे बच गए। धमकी दी गई कि पूरा परिवार कश्मीर छोड़ दे। दस दिनों के भीतर ही परिवार को घाटी छोडनी पड़ी।
घर-बार, सामान सब पीछे छूट गया। दो कपड़ों में बिना चप्पल पहने ही कौल परिवार ने रात के घने अंधेरे में घर छोड़ दिया। जैसे-तैसे जम्मू पहुंचे, जहां से एक फौजी की मदद से शहर आ गए। इसके बाद कभी कश्मीर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
आंखों में आंसू लिए कृष्णा ने बताया कि कपड़े खरीदने के लिए उसने अखबार बेचा। उन्हें बेचकर तीसरा कपड़ा खरीदा। कहने लगी, जब बच्चियों की इज्जत लूटने की बात सुनी, तो जमीन पैरों के नीचे से खिसक गई। इज्जत बचाने के लिए अपनी मातृभूमि छोड़ी।
पहले थे थोक विक्रेता, अब करते है दूसरों के यहां नौकरी
कभी स्टेश्नरी और सेबों के थोक विक्रेता रहे पंडिता परिवार के यहां 50 से ज्यादा लोग काम करते थे। लेकिन अब इन परिवारों को दूसरों के यहां नौकरी कर परिवार का गुजारा करना पड़ रहा है। आलम ये है कि रहने के लिए अब पंडिता परिवार के पास मात्र एक कमरे का मकान है।
कोई रिश्तेदार आ जाए तो सोचना पड़ता है कि कहां बैठाएं। इसलिए जमीन पर दरी बिछी रहती है। कठिन परिस्थितियों में भी परिवार ने हौसला नहीं खोया है। पंडिता परिवार के मुखिया तेजकिशन ने बताया कि उनका परिवार सौपोर कस्बे का सबसे रहीस घर था।
30 एकड़ जमीन में सेब के बागान थे, चार मंजिला मकान थे, किराएदार थे। लेकिन आंतकवादियों ने सब बर्बाद कर दिया। कहने लगा कि जब आंतकवादियों ने हमला किया तो घर का दरवाजा नहीं खुला। छह महीने के बेटे अमित और उसकी मां पिंकी तो जमीन के नीचे तहखाने में छुपाया। उस रात रिश्तेदार कन्हैयालाल को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। जैसे-तैसे फरीदाबाद पहुंचे।
लेकिन यहां सगे रिश्तेदार ने पनाह नहीं दी। सेक्टर नौ में रहने वाले एक सिख परिवार ने शरण दी, खाना दिया। किराए के नाम पर 550 रुपये पर कमरे लिए। सेक्टर 16 में 900 रुपये की नौकरी मिल गई। जिससे जिंदगी की रफ्तार बढ़ी। कहने लगे, पैसे की कमी के चलते सेक्टर नौ से पैदल जाकर पूरे एक साल नौकरी की। कंपनी मालिक ने देखा तो उसने साईकिल दी।
नहीं छोड़ी हिम्मत
सेक्टर दो, तीन, 55, 37, 14, 15 में ऐसे 12 सौ से ज्यादा परिवार है, जिन्हें अपने ही इलाके में बेगाने की तरह रहना पड़ रहा है। नाउम्मीद और उम्मीद के बीच अभी भी इन परिवारों ने हिम्मत नहीं हारी है। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए परिवारों में अभी भी बहु-बेटी को ‘शगन’ देने से लेकर शिवरात्रि पर्व मनाने की परंपरा है। ‘यूथ फॉर पनून कश्मीर और शारीर सेवक’ जैसे संगठन कश्मीर पंडितों के मूलभूत अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। कठिन परिस्थितियों में इन परिवारों ने हिम्मत नहीं छोड़ी है।
कौन समझेगा दर्द
यूथ फॉर पनून कश्मीर के सह-संयोजक डिगंबर कौल कहते है, चरमपंथ के कारण मेरे जैसे सैंकड़ों युवाओं ने अपना बचपन जिया ही नहीं। लेकिन सरकार से लेकर मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवियों ने कभी कश्मीरियों के दर्द को नहीं समझा। वे कहते है, पंडितों ने कश्मीर दहशत में नहीं, बल्कि भारतीयता बचाने के लिए छोड़ा था। जितनी जल्दी कश्मीर समस्या का राजनीतिक हल निकलेगा, उतनी ही जल्दी पंडितों की वापसी संभव हो पाएगी।
कश्मीरी पंडितों की प्रमुख मांगे
-विस्थापित कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी में यूनियन टेरेटरी दर्जे वाले होमलैंड दिए जाएं। जहां विस्थापित कश्मीर को पर्याप्त सुरक्षा दी जाए।
-यूनियन टेरेटरी जगह पर धारा 370 लागू न हो।
-राहत कोष को पुर्नवास कोष के साथ न जोड़ा जाएं।
-कश्मीर टेंपल एंड श्राइन बिल को विधानसभा में पारित करना। -कश्मीर में मंदिरों और श्राइन की भूमि पर कब्जे की जांच।
-उम्रदराज कश्मीरी को एकमुश्त राहत राशि दी जाएं। -कश्मीरी विस्थापितों को रोजगार का विशेष पैकेज।
-कश्मीरी हिन्दुओं को इंटरनली डिसप्ले पर्सन(आईडीपी) कार्ड दिए जाएं।