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Kargil Vijay Diwas: 'मां मैंने दुश्मनों को मार गिराया... जल्द घर आऊंगा', कैप्टन सुमित की मां ने बयां की कहानी

Fri, 26 Jul 2024 09:18 AM IST
शाहरुख खान विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली
विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शाहरुख खान Updated Fri, 26 Jul 2024 09:18 AM IST
सार

कारगिल युद्ध के ढाई दशक बाद भी शहीद कैप्टन सुमित राय की मां सपना राय के कानों में अपने लाडले के साथ हुई अंतिम टेलीफोन की बातचीत आज भी गूंज रही है। अमर उजाला ने उनसे खास बातचीत की है।

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Kargil Vijay Diwas Special conversation with Captain Sumit mother sumit says I killed enemies I will return
Kargil Vijay Diwas - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कारगिल युद्ध को ढाई दशक हो गए हैं, मगर शहीद कैप्टन सुमित राय की मां सपना राय को कारगिल युद्ध कल की ही बात लगती है। उनके कानों में अपने लाडले के साथ हुई अंतिम टेलीफोन की बातचीत आज भी गूंज रही है। 
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वह बात करते समय इसे बार-बार दोहराती हैं। उनके बेटे ने अंतिम बार कहा था कि मां मैंने भारत मां की रक्षा करते हुए पाकिस्तानियों को खदेड़ ही नहीं दिया है, बल्कि दुश्मनों को मार गिराया है। उनके इस कार्य से सेना के अधिकारी काफी खुश हैं। वह जल्द ही घर लौटेंगे। 
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वादे के मुताबिक वह जल्द लौटे तो, लेकिन तिरंगे में लिपटकर। सपना राय बताती हैं कि उनका बेटा तीन जुलाई, 1999 को शहीद हुआ था और उनको चार जुलाई की सुबह सेना के अधिकारियों ने फोन करके बेटे की शहादत के बारे में जानकारी दी थी। उनकी बेटे के साथ अंतिम बार 26 जून, 1999 को बात हुई थी। 
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उस दौरान वह बहुत खुश थे। दरअसल, उन्होंने कारगिल युद्ध में मिली जिम्मेदारी बखूबी निभा दी थी। बेटे की शहादत के मां को बताया गया कि सुमित को दोबारा लड़ाई में भेजा गया था। इस कारण वह घर नहीं आ पाए थे और लड़ाई के दौरान शहीद हो गए। 

सुमित के शहीद होने के बाद उनके लिखे कई पत्र उन्हें मिले, जिसमें सुमित ने अपने शौर्य का जिक्र किया था। वह अपने बेटे की इस दिलेरी को आज भी याद करती रहती हैं और काफी गौरवान्वित महसूस करती हैं। वह सुमित के शहीद होने पर सरकार से मिली सहायता व सम्मान से संतुष्ट हैं, मगर उनको सुमित की कमी हमेशा खलती है।

सुमित की शहादत के बाद परिवार बिखर गया
कैप्टन सुमित की शहादत के बाद उनका परिवार बिखर सा गया था। सात साल तक कई कारणों से उनके परिवार को तीन बार मकान बदलना पड़ा था। वर्ष 2001 में सुमित के पिता सपन राय की मृत्यु हो गई थी। मां सपना को नवाेदय स्कूल की प्रधानाचार्य की नौकरी छोड़नी पड़ी थी।

सुमित राय की शहादत के समय उनका परिवार पालम स्थित राजनगर में रहता था, मगर अब द्वारका में रहता है। केंद्र सरकार ने यहां एक सोसाइटी कारगिल के शहीदों को समर्पित की थी, जिसमें सभी फ्लैट कारगिल के शहीदों के परिजनों को दिए गए थे।
 

भाई से प्रेरणा लेकर भर्ती हुए थे सुमित
बड़े भाई शांतनु राय से प्रेरणा लेकर सुमित राय सेना में भर्ती हुए थे। वह उनसे सेना के किस्से सुनते थे। हालांकि उनके भाई से पहले उनके खानदान में कोई भी सेना में नहीं रहा था। शांतनु अभी कर्नल हैं। 

उमड़ पड़ा था पालम इलाका
सुमित के शहीद होने की खबर मिलने पर पालम इलाका उमड़ पड़ा था। तमाम राजनीतिक दलों के नेता उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पालम स्थित सर्वोदय स्कूल पहुंचे।

पालम से लेकर बरार स्क्वायर तक करीब 10 किमी लंबी अंतिम यात्रा में हजारों लोग पैदल चले थे। शांतनु राय ने जब सेना की वर्दी में भाई की चिता को अग्नि दी, तब पूरा इलाका शहीद सुमित राय के नारों से गूंज उठा था।
 

शहीद कैप्टन अमित वर्मा ने भी युद्ध में निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका 
कारगिल युद्ध में दिल्ली के पंजाबी बाग निवासी सेवानिवृत कर्नल सुरेंद्र वर्मा के बेटे कैप्टन अमित वर्मा ने भी पाकिस्तानी सैनिकों को  पराजित करने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि वह युद्ध में चार जुलाई, 1999 को शहीद हो गए थे। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे। 


 

अमित वर्मा की अंतिम यात्रा में दिल्ली ही नहीं, बल्कि हरियाणा के लोग भी पहुंचे थे। वह मूलरूप से हरियाणा के बराही गांव के रहने वाले थे। दिल्ली छावनी स्थित बरार स्क्वायर श्मशान घाट पर सात जुलाई, 1999 को उनका अंतिम संस्कार किया गया था। सुरेंद्र वर्मा ने अपने लाडले की चिता को मुखाग्नि दी थी। 

 

कैप्टन अमित वर्मा शदीद होने से दो साल पहले सेना में भर्ती हुए थे। उन्हें दिसंबर 1998 में सेना की महार रेजिमेंट के 9 महार में कमीशन मिला और एक जनवरी 1999 को लेह में बटालियन के साथ ड्यूटी के लिए रिपोर्ट किया गया।

कारगिल युद्ध के दौरान उनकी बटालियन को द्रास सेक्टर में भेजा गया था। वह टाइगर हिल पर शहीद हुए थे। कैप्टन अमित वर्मा के पिता सुरेंद्र वर्मा वर्षों तक सेना में कार्यरत रहे। उन्होंने वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई में हिस्सा लिया था। अमित वर्मा के दादा व परदादा भी सेना में अधिकारी रहे थे।
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