मेट्रो फेज-3 की लाइन-8 पर कालिंदी कुंज से कालकाजी तक शुरू हुआ ट्रायल रन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिल्ली मेट्रो फेज-3 की लाइन-8 (जनकपुरी पश्चिम से बॉटनिकल गार्डन) पर चल रहे ट्रायल रन का बृहस्पतिवार को विस्तार कर दिया गया। मेट्रो ने अब कालिंदी कुंज से कालकाजी मेट्रो स्टेशन के बीच 9.5 किलोमीटर की दूरी पर ट्रायल शुरू कर दिया है।
पहले यह ट्रायल कालिंदी कुंज से ओखला के बीच हो रहा था। डीएमआरसी के मुताबिक, कालिंदी कुंज से कालकाजी के बीच सिविल कार्य लगभग पूरा हो चुका है। धीरे-धीरे इस लाइन पर ट्रायल रन की दूरी बढ़ा रहे हैं।
अब कालिंदी कुंज से कालकाजी के बीच मेट्रो स्टेशन कालिंदी कुंज, जसोला विहार, शाहीन बाग, ओखला विहार, जामिया मिलिया इस्लामिया, सुखदेव विहार, ओखला और कालकाजी स्टेशन पर ट्रायल शुरू हो गया है। सभी स्टेशन एलिवेटेड लाइन पर हैं।
तीन चरणों में होता है मेट्रो का ट्रायल
इस लाइन पर ड्राइवरलेस ट्रेन चलाई जाएगी। उन्हीं ट्रेन के साथ ट्रायल भी किया जा रहा है। पहले चरण में ट्रेनों में चालक मौजूद रहेंगे। दूसरे चरण में इसे
बगैर ड्राइवर के चलाया जाएगा। सिंगनलिंग सिस्टम के साथ ऑपरेशन कंट्रोल रूम से ट्रेन के जुड़ाव समेत अन्य तकनीकी की जांच की जाएगी।
डीएमआरसी के मुताबिक, धीरे-धीरे इस लाइन पर ट्रायल रन की दूरी बढ़ाई जाएगी। इसी वर्ष अक्तूबर में कालिंदी कुंज से बॉटनिकल गार्डन के बीच ट्रायल रन और फिर नवंबर में जनकपुरी पश्चिम से डोमेस्टिक एयरपोर्ट स्टेशन के बीच ट्रायल रन शुरू करने का डेडलाइन रखी गई है। हालांकि दिल्ली मेट्रो पहले से तय डेडलाइन को मिस कर चुकी है।
तीन चरणों में होता है ट्रायल
मेट्रो के मुताबिक, ट्रायल तीन चरणों में किया जाता है। इसे पूरा करने में कम से कम तीन महीने का समय लगता है। मेट्रो प्रबंधन खुद उससे संतुष्ट होने के बाद ही सेफ्टी कमिश्नर के बाद जाता है।
पहले कालिंदी कुंज से ओखला के बीच होना था ट्रायल
पहले चरण में ट्रेन को धीमी गति में चलाया जाता है। ट्रैक समेत फिजिकल जांच की जाती है। इसमें ट्रेन चलते समय पटरी ठीक है या नहीं, दरवाजे खुलने पर प्लेटफॉर्म से कहीं टच तो नहीं हो रहा है।
ट्रेन चलने, कर्व में कई कुछ दिक्कत तो नहीं है। दूसरे चरण में मेट्रो तकनीकी पार्ट की जांच करती है। इसमें सिंगनलिंग, ऑपरेशन कंट्रोल रूम से संपर्क समेत अन्य तकनीकी की जांच की जाती है। दो चरणों में पास होने के बाद नॉन रेवन्यू ट्रायल होता है।
मसलन ट्रेन बगैर यात्री के लाइन पर बिल्कुल वैसे चलती है, जैसे ऑपरेशन होने के बाद चलती है। ट्रेन सभी स्टेशनों पर रुकती है। दरवाजे खुलते हैं व बंद होते हैं।
ऑपरेशन कंट्रोल रूम से उसे ऑपरेट किया जाता है। इसमें सफलता मिलने के बाद फिर सेफ्टी कमिश्नर के पास जाते हैं। वहां से प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही उसे आम लोगों के लिए खोला जाता है।