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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   India's tribal art will be showcased in Venice

Delhi NCR News: वेनिस में बजेगी भारत की जनजातीय कला की धुन

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 10 Oct 2025 10:59 PM IST
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जनजातीय कला प्रदर्शनी में दिखा वन, वन्यजीवन और जनजातीय संस्कृति का संगम
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ज्योति सिंह
नई दिल्ली। भारत की जनजातीय कला अब दुनिया के सबसे बड़े मंच पर गूंजने जा रही है। केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने शुक्रवार को भारत के जनजातीय कलाकारों की प्रतिष्ठित वेनिस बिएनाले 2026 में हिस्सा लेने की घोषणा की। यह घोषणा नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय कला और भारत का संरक्षण दृष्टिकोण सम्मेलन के दौरान की। उन्होंने कहा, कि जनजातीय कलाकार भारत की संस्कृति के असली वाहक हैं और अब उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का समय आ गया है।

सम्मेलन का आयोजन संस्कला फाउंडेशन ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल और भारतीय उद्योग परिसंघ के साथ मिलकर किया था। सम्मेलन स्थल पर लगी प्रदर्शनी 'साइलेंट कन्वर्सेशन फॉर्म मार्जिन्स टू द सेंटर' ने सबका मन मोह लिया। दीवारों पर सजी पेंटिंग्स जैसे जंगलों की कहानियां सुना रही थीं। कहीं हरे पत्तों के पीछे छिपा बाघ था, कहीं मां की गोद में सिमटी प्रकृति। बस्तर से आए गुजराल सिंह बघेल की पेंटिंग में वन रक्षक की झलक दिखी। पेंटिंग के जरिये एक ऐसे व्यक्तित्व को दर्शाया गया जो बाघों की रक्षा करता है।
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राजेन्द्र सिंह राजावत की पेंटिंग 'टाइगर फेस बिहाइंड द लीव्स' में रणथंभौर के जंगलों की गहराई और रहस्य झलकते रहे थे। वहीं, रागिनी धुर्वे की कलाकृति 'द एंब्रेस ऑफ मदर में गोंड' कला के रंगों से मां और धरती के अटूट संबंध को खूबसूरती से उकेरा गया। छत्तीसगढ़ की कलाकार प्रेरणा नाग की पेंटिंग 'फीयरलेस' में आधुनिक स्त्री की निडरता और प्रकृति के प्रति उसकी जुड़ाव की झलक दिखती है। इन सभी चित्रों में एक समान भावना थी। इनमें था प्रकृति, जनजातीय जीवन और मनुष्य के बीच मौन संवाद।
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सरकार ऑरेंज इकोनॉमी को दे रही बढ़ावा

सम्मेलन में मंत्री शेखावत ने कहा कि सरकार अब ऑरेंज इकोनॉमी यानी रचनात्मक कला आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे रही है। अगर हमें अपनी संस्कृति को जिंदा रखना है, तो उसे आजीविका से जोड़ना जरूरी है। उन्होंने बताया कि जनजातीय समाज न सिर्फ कला के संरक्षक हैं, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति के असली रक्षक भी हैं। भारत की विविधता हमारी शक्ति है, और इसी रचनात्मक ऊर्जा से हम एक सशक्त सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था बना सकते हैं।


जनजातियों से सीखे जाने वाले सबक

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन ने कहा कि भारत की लगभग 700 जनजातियां आज भी अपने पारंपरिक ज्ञान को सहेजे हुए हैं। वे जंगलों के असली रखवाले हैं लेकिन जरूरत है कि उनके बच्चे आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक ज्ञान दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ें।


जंगल वहीं बचे हैं जहां जनजातियां बसी हैं

पूर्व निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार ने सवाल उठाया कि क्या संविधान की पांचवीं अनुसूची में जनजातीय क्षेत्रों के अधिकार वास्तव में पूरे हो रहे हैं। वहीं, पूर्व जनजातीय कार्य सचिव प्रवीर कृष्ण ने कहा, भारत के जंगल आज इसलिए बचे हैं क्योंकि वहां जनजातीय लोग रहते हैं। बस्तर जैसे क्षेत्र भी विकास चाहते हैं लेकिन अपने मूल स्वभाव को खोए बिना।



कला को नई पहचान देने की जरूरत

आईबीसीए के महानिदेशक डॉ. एसपी यादव ने कहा कि स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहन देकर उन्हें राष्ट्रीय धारा से जोड़ना चाहिए। वहीं, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे ने कहा कि बाजार की ताकतें जनजातीय समाज के विश्वासों को प्रभावित कर रही हैं। इसलिए शहरी समाज को उनकी संस्कृति का सम्मान करना चाहिए। पूर्व संस्कृति सचिव राघवेंद्र सिंह ने सुझाव दिया कि यह प्रदर्शनी साइलेंट कन्वर्सेशन राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय और ललित कला अकादमी जैसे बड़े मंचों पर भी दिखाई जानी चाहिए, ताकि आम लोग भी जनजातीय कला की आत्मा को महसूस कर सकें।
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