Indian Trade Fare: हजार साल से 14वीं पीढ़ी बना रही अरनमुला दर्पण, 13 शहरों की मिठाइयों का एक जगह स्वाद
छोटे से छोटे आकार का अरनमुला दर्पण की कीमत दो से बीस हजार रुपये तक है। दर्पण की गोलाई के बाद इसपर की गई नक्काशी और कारीगरी की वजह से इसकी कीमत तय होती है।
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केरल में करीब हजार साल से एक परिवार की 14वीं पीढ़ी परंपरागत तरीके से अरनमुला दर्पण बनाने का काम कर रही है। परिवार की ओर से बनाया गया दर्पण लंदन संग्रहालय में रखा गया है। यह दर्पण पहली बार ट्रेड फेयर में आया है। केरल पवेलियन में दर्पण को बनते देखा जा सकता है। यह देश के उन उत्पादों में से एक है, जिसे जीआई टैग हासिल है। कॉयर और टिन मिलाकर दर्पण को बनाया जाता है। इसे ‘अरनमुला कन्नाडी’ कहते हैं। मलयालम और तमिल में दर्पण का मतलब कन्नाडी है। दुनियाभर के सेलिब्रिटी इस दर्पण को एक-दूसरे को उपहार में देते हैं।
मेले में अरविंदन इसे बनाने का डेमो देते हैं। उन्होंने बताया कि एक दर्पण बनाने में महीनों का समय लगता है। धातु को काटने के बाद लंबे समय तक इसकी घिसाई होती है। लंदन संग्रहालय में जिस दर्पण को रखा गया है, इसे उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर करीब डेढ़ साल में बनाया था। छोटे से छोटे दर्पण को बनाने में दो-तीन महीने का समय लग जाता है।
शीशे से नहीं धातु से बनता है दर्पण
यह दर्पण शीशे के बजाय धातु से बनता है। इसे बनाने की प्रक्रिया पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है। दर्पण बनाने की यह कला एक से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती है। अरनमुला में इसे कुछ परिवार बनाते हैं। शीशे के दर्पण में उसके भीतरी सतह पर किए गए पारे के लेप के कारण प्रतिबिंब बनता है, जबकि इस छवि मुख्य सतह पर ही बनती है। खराब गुणवत्ता वाले शीशे के दर्पण में छवि टेढ़ी-मेढ़ी भी बनती है। लेकिन अरानमुला कन्नाडी में सटीक छवि उभरकर आती है। यही कारण है कि मंहगा होने के बावजूद दुनियाभर में काफी मांग है।
बीस हजार तक है कीमत
छोटे से छोटे आकार का अरनमुला दर्पण की कीमत दो से बीस हजार रुपये तक है। दर्पण की गोलाई के बाद इसपर की गई नक्काशी और कारीगरी की वजह से इसकी कीमत तय होती है।
एक दुकान पर यूपी के 13 शहरों की मिठाइयां
ट्रेड फेयर में उत्तर प्रदेश के 13 शहरों की मशहूर मिठाइयां एक ही जगह पर मिल रही हैं। गाजियाबाद के अमित चौधरी ने स्टार्टअप शुरू किया है। विभिन्न शहरों की नामचीन दुकानों से हरेक दिन वह मिठाइयां मंगाते हैं और यूपी पवेलियन में उनके स्टाल से लोग इन मिठाइयों को फटाफट खरीदकर रहे हैं। अपने स्टार्टअप की सफलता को देखकर उन्होंने अब गाजियाबाद में स्थायी व्यवसाय का शुरू किए जाने का निर्णय लिया है।
अमित चौधरी ने ‘यूपी का स्वाद’ नाम से स्टाल लगाया है। यहां वाराणसी की लौंगलता, परवल का लड्डू, मेरठ की रबड़ी, गजक, अलीगढ़ की कुंजीलाल की नमकीन, फतेहपुर का मालवा पेड़ा (सोहन पेड़ा), कानपुर का ठग्गू का लड्डू, मथुरा का बृजवासी का पेड़ा, लखीमपुर खीरी के मैंगलगंज का गुलाब जामुन, शाहजहांपुर की तिलहर लौज, आगरा का पंछी पेठा, चित्रकूट मानिकपुर का पेड़ा, प्रयागराज के हरीराम के समोसे, दादरी का कलाकंद और बीबी नगर की बाल मिठाई उपलब्ध है। वह इसमें और कई शहरों की मशहूर मिठाइयों को शामिल करने की तैयारी में हैं।
अमित ने बताया कि इस स्टार्टअप का आइडिया दोस्त ने दिया था। इसके बाद यूपी सरकार से स्टाल के लिए संपर्क किया। सरकार को आइडिया अच्छा लगा। उन्होंने पहली बार ट्रेड फेयर में इसे लागू किया और सफलता मिली। उन्होंने बताया कि इससे उन्हें अच्छा अनुभव मिला है। 28 नवंबर के बाद इस व्यवसाय को वह गाजियाबाद में लॉन्च करेंगे।
कन्नौज का इत्र घोल रहा सुगंध
यूपी पवेलियन में कन्नौज के इत्र की सुगंध घुली हुई है। जमकर इसकी खरीदारी भी हो रही है। सागर दीक्षित यहां अपने इस पुश्तैनी व्यवसाय को लेकर आए हैं। वह 1,600 वैरायटी के इत्र बनाते हैं। ट्रेड फेयर में वह 100 वैरायटी लेकर आए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी उनका परिवार प्राकृतिक तरीके से इत्र तैयार कर रहा है। उनका एक तोला इत्र 200 से 5000 रुपये का है। महंगा होने के बावजूद यह लोगों को खूब पसंद आ रहा है।