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तेजी से खराब हो रही है दिल्ली की हवा, ये है सबसे बड़ी वजह

Mon, 15 Oct 2018 03:06 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 15 Oct 2018 03:06 PM IST
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India seventh most environmentally unsafe country in world
Demo Pic - फोटो : PTI

देश की राजधानी हर वक्त किसी न किसी मुसीबत से लड़ती रहती है। किसी समस्या से लड़ने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है व्यक्ति का मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ्य होना। लेकिन अब दिल्ली की आवोहवा उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई है। वाहनों और कारखानों से पटे इस शहर को अब सांस लेने में काफी तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। इस संबंध में एक शोध सामने आया है जिसके आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं।

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एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार यह पता चला है कि ट्रैफिक जाम की स्थिति इसे और भयानक बना रही है। इस दौरान अधिक ईंधन जलने के कारण सामान्य स्तर से प्रदूषण 4 से 8 गुना अधिक होता जाता है। इस ईंधन(डीजल, पेट्रोल, सीएनजी) के प्रदूषण से 40 अलग-अलग प्रकार के खतरनाक बीमारियां पैदा होती हैं। इसमें 70 प्रतिशत प्रदूषण गाड़ियों से ही होता है। शोध में पता चला कि बैंगलोर के 30 प्रतिशत बच्चे प्रदूषण के कारण अस्थमा से जूझ रहे हैं। इस शहर को अस्थमा की राजधानी कहा जाने लगा है।
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अभी यह समस्या बनी ही हुई थी कि दिल्ली के आसपास के किसानों ने यह घोषणा कर दी है कि वह पराली जलाना जारी रखेंगे और इसी बीच मौसम विभाग के अधिकारियों ने भी हवा की दिशा बदलने की बात कही है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में दिल्ली-एनसीआर व आसपास के इलाकों में वायु की गुणवत्ता और खराब हो सकती है।

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महीने के अंत तक बहुत खराब तक जा सकती है।

पिछले कुछ सालों से जीआरएपी सर्दियों के मौसम में वायु की गुणवत्ता खराब होने पर काम करती है। जीआरएपी ऑड-ईवन लागू करने से लेकर निर्माण कार्य पर बैन भी लगाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गुरुवार की बैठक में कहा गया कि अक्तूबर के पहले सप्ताह से ही वायु की गुणवत्ता खराब(पुअर) स्थिति में बनी हुई है और यह स्थिति महीने के अंत तक बहुत खराब तक जा सकती है।

पर्यावरण एवं विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा था कि पंजाब में पराली जलाने से न केवल देश का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, बल्कि दुनिया में बदनामी भी होगी। देश को पर्यावरण संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र का पुरस्कार भी मिला है। ऐसे में राज्यों को इसकी अहमियत समझकर काम करना होगा।

आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने मशीन तैयार किया है। अब इसे जलाने की बजाय किसान एक किलो पराली से 45 रुपये तक की कमाई करेंगे। यह पायलट प्रोजेक्ट ग्रामोद्योग में सफल रहा है। अब पराली जलाने वाले राज्यों में इस तकनीक को लेकर जाने की तैयारी है।

एक एकड़ जमीन से निकलती है करीब दो टन पराली

आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर बॉयोमेडिकल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर नीतू सिंह की अध्यक्षता में रिसर्च स्कॉलर्स अंकुर कुमार व प्राचीर दत्ता ने यह तकनीक तैयार की है। प्रो. नीतू के मुताबिक पराली जलाने के चलते दिल्ली गैस की चैंबर बन जाती है। साथ अन्य पड़ोसी राज्य में धुंध छा जाता है, जिसका असर आम आदमी की सेहत पर पड़ता है। इसके लिए किसानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। हालांकि अब किसान इसी पराली से मालामाल होंगे।

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा सरकार से जल्द मुलाकात  
टीम सदस्यों के मुताबिक, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब सरकार और किसानों से इस तकनीक को साझा करने की तैयारी चल रही है। इससे पहले आईआईटी दिल्ली कैंपस में ग्रामोद्योग परिसर में पायलट प्रोजेक्ट लगाया गया था जो सफल रहा है। इन राज्यों में किसानों को मशीन लगाने की जानकारी के साथ बाद में पल्प से तैयार होने वाले प्रोडक्ट बनेंगे।

आठ से दस किसान मिलकर लगा सकते हैं सेटअप
प्रो. नीतू के मुताबिक, इस तकनीक में सबसे पहले एक मशीन लगेगी। आठ से दस किसान मिलकर मशीन सेटअप कर सकते हैं। मशीन पराली को काटेगी और उसमें आईआईटी दिल्ली द्वारा तैयार पेंटेंट केमिकल डाला जाएगा, जिससे पल्प के साथ-साथ लिगमिन तैयार होगा। इस पल्प से इॅको फ्रेंडली कप व प्लेट तैयार किए जाएंगे, जिसे खाओ-फेंको का नाम दिया गया है।

एक एकड़ जमीन से करीब दो टन पराली निकलती है। इससे एक टन पल्प तैयार होगा। इसका इस्तेमाल पेपर मेकिंग प्लांट वाले करते हैं जो 45 रुपये प्रति किलो बिकती है। इसलिए अब किसान घर बैठे पराली से 45 रुपये प्रति किलो की कमाई करेंगे। जबकि लिगमिन बैटरी या फेबीकॉल आदि तैयार करने में प्रयोग होगा। लिगमिन मार्केट में 70 रुपये प्रति किलो के आधार पर बिकता है।

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