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Alert: स्क्रीन टाइम बढ़ने से आंखों के साथ दिमाग भी हो रहा है बीमार, डिजिटल आई स्ट्रेन की गिरफ्त में नौनिहाल

Sun, 04 Jan 2026 02:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा सोनम प्रतिहस्त, नई दिल्ली
सोनम प्रतिहस्त, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 04 Jan 2026 02:18 AM IST
सार

डॉक्टरों ने कहा कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बच्चों में डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या बढ़ रही है।

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Increased screen time is harming children's eyes and brains.
स्क्रीन टाइम (सांकेतिक) - फोटो : फ्रीपिक

विस्तार

स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों की न केवल आंखें बल्कि दिमाग भी प्रभावित हो रहा है। डॉक्टरों ने कहा कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बच्चों में डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या बढ़ रही है। आंखों में जलन, सूखापन, सिरदर्द, धुंधला दिखना और आंखों का लाल होना आम लक्षण बनते जा रहे हैं। सिर्फ आंख ही नहीं, बल्कि बच्चों का दिमाग भी स्क्रीन टाइम से प्रभावित हो रहा है। अतिरिक्त स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता और यादाश्त पर असर भी असर डालता है।

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चिड़चिड़े हो जाते हैं बच्चे
डाक्टरों ने कहा कि बच्चे जल्दी ही चिड़चिड़े हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं। स्क्रीन पर दिखने वाली तेज रोशनी और लगातार बदलती तस्वीरें दिमाग को जरूरत से ज्यादा प्रभावित करती हैं, जिससे नींद की समस्या भी बढ़ रही है। पढ़ाई, मनोरंजन, जानकारी और संवाद जैसी हर जरूरत के लिए स्क्रीन का सहारा लेना आम बात हो गई है। ऑनलाइन कक्षाओं, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और कार्टून देखने के चलते बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों की आंखों और दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव उनके व्यवहार पर देखने को मिलता है। डाक्टरों ने कहा कि अगर बच्चे में लंबे समय तक गुस्सा, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, पढ़ाई में गिरावट या व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, तो इसे नजरअंदाज न करें। समय रहते मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने से बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है।
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मोबाइल और लैपटॉप बच्चों के लिए हैं ज्यादा खतरनाक
मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ मनोचिकित्सक मेडिकल डिप्टी सुपरिंटेंडेंट डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि आज के समय में मोबाइल और लैपटॉप बच्चों की पढ़ाई और मनोरंजन का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। माता-पिता बच्चों में चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, नींद की परेशानी और सामाजिक दूरी जैसे बदलाव महसूस कर रहे हैं। इस स्थिति में घबराने के बजाय संतुलित और समझदारी भरा कदम जरूरी है।
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केस स्टडी एक
बच्चे का स्क्रीन टाइम बढ़ता गया, बदलता रहा व्यवहार
पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद के रहने वाले व एक प्राइवेट स्कूल में 7वीं कक्षा के छात्र के माता-पिता पहले अपने बेटे को पढ़ाई में ठीक और स्वभाव से शांत बताते थे। ऑनलाइन क्लास शुरू होने के बाद धीरे-धीरे बच्चे का स्क्रीन टाइम बढ़ता गया। पढ़ाई के अलावा वह मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने लगा। कुछ महीनों बाद माता-पिता ने नोटिस किया कि बच्चा छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ा हो जाता है, बात काटने लगा है और रात में देर से सोता है। स्कूल से शिकायत आने लगी कि बच्चा क्लास में ध्यान नहीं देता और जल्दी थक जाता है। जांच में कोई शारीरिक समस्या नहीं पाई गई। काउंसलिंग के दौरान यह साफ हुआ कि बच्चा दिन में कई घंटे स्क्रीन पर बिताता है और उसका नींद और जागने का संतुलन बिगड़ चुका है।


मोबाइल से दूरी पर गुस्सा और भावनात्मक खिंचाव
पूर्वी दिल्ली के सभापुर निवासी छठी कक्षा की छात्रा को उसके माता-पिता उसे अस्पताल इसलिए लेकर आए, क्योंकि वह अब अकेले रहना पसंद करने लगी थी। पहले वह दोस्तों के साथ खेलती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह अधिक समय सोशल मीडिया और रील्स देखने में लगाने लगी। माता-पिता को लगा कि यह उम्र का असर है, लेकिन समय के साथ बच्ची में आत्मविश्वास की कमी, उदासी और पढ़ाई में अरुचि दिखने लगी। काउंसलिंग में सामने आया कि बच्ची स्क्रीन पर मिलने वाली त्वरित संतुष्टि की आदी हो गई थी और असल दुनिया से कटाव महसूस कर रही थी। धीरे-धीरे वह स्थिर हो गई।

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