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स्मृति शेष: एक समय दिल्ली में आडवाणी से बड़े नेता थे प्रो. मल्होत्रा, अद्वितीय था अनुशासन और समय प्रबंधन
Wed, 01 Oct 2025 06:41 AM IST
दुष्यंत शर्मा
विनोद डबास, नई दिल्ली
विनोद डबास, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 01 Oct 2025 06:41 AM IST
सार
प्रो. मल्होत्रा का राजनीतिक व्यक्तित्व का मूल मंत्र अनुशासन, दूरदर्शिता और जनता के प्रति समर्पण था।
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- फोटो : एएनआई
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विस्तार
दिल्ली की राजनीति में एक दौर ऐसा भी था जब प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा की साख और प्रभाव लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेताओं से भी कहीं अधिक था। वर्ष 1967 में दिल्ली महानगर परिषद का पहला चुनाव भारतीय जनसंघ ने प्रो. मल्होत्रा के नेतृत्व में लड़ा और भारी अंतरों से जीत दर्ज की।
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परिषद में छह सदस्यों के मनोनीत होने के प्रावधान के तहत लालकृष्ण आडवाणी उनमें शामिल थे और उनको परिषद का चेयरमैन (अध्यक्ष) बनाया गया जबकि प्रो. मल्होत्रा को मुख्य कार्यकारी पार्षद नियुक्त किया गया। यह पद मुख्यमंत्री के समकक्ष माना जाता था।
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लालकृष्ण आडवाणी को प्रो. मल्होत्रा से पहले जनसंघ का प्रदेश अध्यक्ष बनने का अवसर मिला। प्रो. मल्होत्रा पार्टी के ऐसे नेता रहे जो जनसंघ, जनता पार्टी और बाद में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। उन्हें वर्ष 1972 में आडवाणी के स्थान पर प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इस पद पर वह तीन वर्ष तक रहे और वर्ष 1977 से 1980 तक वह जनता पार्टी के भी प्रदेश अध्यक्ष रहे। वर्ष 1980 में भाजपा का गठन होने पर उन्हें पहला प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और वह 1984 तक इस पद पर रहे।
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विपक्षियों पर एक दायरे में लगाते थे आरोप
प्रो. मल्होत्रा का राजनीतिक व्यक्तित्व का मूल मंत्र अनुशासन, दूरदर्शिता और जनता के प्रति समर्पण था। वह हमेशा विपक्षी नेताओं पर बिना सोचे-समझे आरोप नहीं लगाते थे और संसद में अपनी बात इतनी तर्कसंगत और सौम्य शैली में रखते थे कि उनकी और विपक्षी नेताओं की छवि दोनों सुरक्षित रहती थी। उनकी राष्ट्रीय राजनीति में रुचि नहीं होने के बावजूद पार्टी ने लोकसभा में उन्हें प्रतिपक्ष के उप नेता की जिम्मेदारी दी थी। उन्हें याद करते हुए सांसद कमलजीत सहरावत, बांसुरी स्वराज, रामवीर सिंह बिधूड़ी, प्रवीन खंडेलवाल व योगेंद्र चांदोलिया भावुक हो गए।
अनुशासन और समय प्रबंधन भी अद्वितीय था
प्रो. मल्होत्रा का अनुशासन और समय प्रबंधन भी अद्वितीय था। उनका कामकाज और नेताओं से मिलने का समय हमेशा निश्चित रहता था। तय समय पर जो नेता पहुंचते, उन्हें ही प्रवेश मिलता। एक बार प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता साहब सिंह देर से पहुंचे थे, तब तक उनका दरवाजा बंद हो चुका था। यह स्पष्ट संकेत था कि अब प्रवेश संभव नहीं है।
प्रो. मल्होत्रा बेहद चतुर रणनीतिक थे
प्रो. मल्होेत्रा राजनीतिक रूप से बेहद चतुर और रणनीतिक थे। 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह को वर्ष 1999 में उन्होंने दक्षिण दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से हराया था। उनकी जीत की चर्चा आज भी होती है। क्योंकि डा. मनमोहन सिंह के सामने उनका कद काफी छोटा माना जा रहा था।