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1984 में देश ने 1947 के बाद देखा दूसरा बड़ा दंगा, सिख समुदाय की व्यापक स्तर पर की गई थी हत्याएं

Mon, 17 Dec 2018 09:48 PM IST
Vikas Kumar धीरज बेनीवाल, अमर उजाला, नई दिल्ली
धीरज बेनीवाल, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Mon, 17 Dec 2018 09:48 PM IST
In 1984 the country saw the second major riot since 1947
1984 सिख दंगे - फोटो : फाइल फोटो

1947 में विभाजन के बाद हुए दंगों में लाखों सिख, मुस्लिम व हिंदू नागरिक मारे गए थे। इसके 37 साल बाद देश ने मानवीय त्रासदी का दूसरा बड़ा दंगा 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देखा। यह मानवता के प्रति अपराध था और इसमें व्यापक स्तर पर हत्याएं की गईं। दंगों में राजधानी में 2733 सिख मारे गए और उनके घरों को फूंक दिया गया। देश के दूसरे हिस्सो में भी सिखों को मारा गया। इन दंगों को करवाने वाले दशकों तक बचे रहे। यह मार्मिक टिप्पणी हाईकोर्ट ने पूर्व कांग्रेसी सांसद सज्जन कुमार को सजा सुनाते हुए की। 



न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने अपने फैसले में आजादी के समय हुए दंगों पर कवयित्री अमृता प्रीतम की कविता ओड टू वारिस शाह का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने दंगों में लाखों लोगों के नरसंहार का जिक्र किया। इस कविता में प्रीतम ने कहा कि दंगों ने खूबसूरत पंजाब को बदरंग कर दिया और कत्लेआम अब दिल्ली की गलियों में भी होगा। 


न्यायमूर्ति मुरलीधर ने दंगों का जिक्र करते कहा कि यह दूसरा बड़ा दंगा था, जिसे देश ने देखा। दंगों में राजधानी में ही 27 सौ ज्यादा सिखों को मार दिया गया। उच्च न्यायालय ने पुलिस व जांच एजेंसी की साख पर उंगली उठाते कहा इन अपराधों को अंजाम देने वाले राजनीतिक संरक्षण के कारण बचते रहे और पुलिस ने उनकी मदद की। जांच के लिए बनी दस कमेटी व आयोगों की जांच के बाद इसकी जिम्मेदारी 2005 में सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने दंगों के 21 साल बाद इनकी जांच शुरू की। 
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केस में अहम रही चश्मदीदों की गवाही
उच्च न्यायालय ने कहा यह मानवता के प्रति अपराध था और इसके दोषियों को अंजाम तक पहुंचाने में चश्मदीद गवाहों की बहादुरी व लगन की अहम भूमिका रही है। जगदीश कौर के पति व बेटे तथा उसके तीन देवरों को मार दिया गया था, उसका भाई जगशेर सिंह तथा निरप्रीत कौर, जिसने गुरुद्वारा जलते हुए देखा और जिसके पिता को जिंदा जलाया गया, यह सभी गवाह अपने बयानों व सच्चाई पर टिके रहे। यह सीबीआई की जांच शुरू होने के बाद ही अपनी बात कह पाए। दंगों के दोषियों को अंजाम तक पहुंचाने में तीन दशक से ज्यादा समय लगा और इस दौरान न्यायिक प्रणाली की कई बार परीक्षा हुई लेकिन लोकतंत्र में अपराधियों को सजा दिलाना बेहद जरूरी है। दूसरी ओर पीड़ितों के मन में यह विश्वास पैदा करना जरूरी है कि सच्चचाई जिंदा रहेगी और न्याय जरूर होता है। 

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