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'गैर कानूनी आयोग' ने जारी किया मीणा के खिलाफ गैर जमानती वारंट

Fri, 11 Sep 2015 09:32 PM IST
Updated Fri, 11 Sep 2015 09:32 PM IST
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'Illegal Commission has issued non-bailable warrant against Meena

सीएनजी फिटनेस घोटाला मामले की जांच कर रहे जस्टिस एसएन अग्रवाल जांच आयोग ने भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के चीफ मुकेश मीणा के लिए गैर जमानती वारंट जारी किया है।

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साथ ही वेतन में 30 फीसदी राशि काटने का आदेश भी जारी किया है। वहीं, दूसरी तरफ केंद्र सरकार इस आयोग को गैर कानूनी करार दे चुका है। ऐसे में गैर जमानती वारंट को लागू कराने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

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मुकेश मीणा को वेतन काटे जाने वाली चिट्ठी भेजी गई है तो गैर जमानती वारंट की तालीम कराने वाली चिट्ठी एसएचओ सिविल लाइन को भेजी गई है। उसमें लिखा गया है कि 15 सितंबर तक संयुक्त सचिव (एसीबी) को पेश करें।

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कागजात उपलब्ध कराने का समन भेजा गया था

'Illegal Commission has issued non-bailable warrant against Meena

अगर पेश नहीं कर पाते हैं तो उसका कारण लिखकर वारंट वापस कमिशन को दें। दोनों चिट्ठी आयोग के सचिव आशीष कुमार की तरफ से भेजी गई हैं।


मुकेश मीणा को 4 सितंबर को एसएन अग्रवाल जांच आयोग के सामने पेश होने व कागजात उपलब्ध कराने का समन भेजा गया था। खुद हाजिर नहीं होने की दशा में वकील के माध्यम से रिकॉर्ड भिजवाने की भी छूट थी।

यह कहा गया था कि अगर उपस्थित नहीं होते और रिकॉर्ड नहीं देते तो एक्स पार्टी करके जांच की कार्रवाई आगे बढ़ाई जाएगी। वो पेश नहीं हुए, फिर सीएनजी वाहन फिटनेस घोटाले से जुड़े कागजात जांच आयोग को नहीं देने के आदेश भी मीणा ने जारी किए थे।

गैर जमानती वारंट की तामील होनी चाहिए

'Illegal Commission has issued non-bailable warrant against Meena

दिल्ली सरकार के अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि मामला कोर्ट में है और कोई स्टे नहीं लगाया गया है। जांच आयोग अपना काम कर रहा है। ऐसे में गैर जमानती वारंट की तामील होनी चाहिए।


वहीं, दूसरी तरफ कुछ अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि जांच आयोग को केंद्र सरकार गैर कानूनी करार दे चुकी है तो फिर गैर जमानती वारंट का कोई खास मतलब नहीं है। फिर मुकेश मीणा दिल्ली पुलिस से ही हैं और वारंट का तामील कराने का काम भी पुलिस के पास है।

दिल्ली कैबिनेट ने कमीशंस ऑफ एंक्वायरी एक्ट, 1952 का हवाला देकर रिटायर जस्टिस एसएन अग्रवाल की अध्यक्षता में जांच आयोग गठन का फैसला 11 अगस्त को किया था। जिसे पहली बैठक के बाद तीन महीने में रिपोर्ट देनी है।

गठन के पूर्व उपराज्यपाल से अनुमति नहीं ली गई। मामले को उपराज्यपाल की तरफ से गृह मंत्रालय के पास आयोग की वैधता जानने के लिए भेजा गया। गृह मंत्रालय की तरफ से आयोग को गैर कानूनी करार देने की जानकारी उपराज्यपाल की तरफ से सामने आई। इससे पूर्व आयोग के अध्यक्ष ने जांच शुरू कर दी थी।

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