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साइबर ठग अपनाते हैं ये 3 तरीके, जान लेंगे तो नहीं होंगे शिकार

Sun, 10 Dec 2017 10:27 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Sun, 10 Dec 2017 10:27 AM IST
सार

-पीड़ितों को मामला दर्ज करवाने के लिए काटने पड़ते हैं थाने चौकियों के चक्कर 
लोगों की खून-पसीने की कमाई पर डाका डाल रहे साइबर ठग
-पीड़ितों को मामला दर्ज करवाने के लिए काटने पड़ते हैं थाने चौकियों के चक्कर
 

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- फोटो : self

विस्तार

लोगों की खून-पसीने की कमाई को साइबर ठग चंद क्षणों में उनके बैंक खातों से साफ कर रहे हैं। जो भी साइबर ठगी का शिकार हो रहा है, उसके पास सिवाय अपना माथा पीटने के और कोई चारा नहीं है। पुलिस भी मामला दर्ज करने से ज्यादा उनकी कोई मदद नहीं कर पा रही है।

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पीड़ित को मामला दर्ज करवाने के लिए भी थाने चौकियों में एडिय़ां घिसनी पड़ती हैं। साइबर ठगी के रोज औसतन चार मामले सामने आ रहे हैं। सबसे ज्यादा मामले एटीएम कार्ड नंबर अपडेट करने के नाम पर पिन नंबर आदि पूछ लेना और फिर अगले ही कुछ पलों में खाते से रुपये निकल जाने के आ रहे हैं।
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पिछले कुछ समय में ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें एटीएम कार्ड जेब में पड़ा था, किसी का फोन भी नहीं आया, फिर भी खाते से रकम निकल गई। ऐसे मामले एटीएम क्लोङ्क्षनग से जुड़े हैं। कुछ मामलों में पीड़ित के खाते से ऑनलाइन शॉपिंग के जरीये रुपये निकल गए हैं।

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क्या-क्या हथकंडे अपनाते हैं ठगी के

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- बैंक अधिकारी बनकर किसी को भी फोन कर कहा जाता है कि बैंक खाता या एटीएम कार्ड अपडेट किया जाना है, इसलिए अपना कार्ड नंबर आदि बताएं। ऐसा न होने पर खाता ब्लॉक करने की बात कही जाती है। अब अनजाने में लोग अपना एटीएम कार्ड या खाते से संबंधित गोपनीय जानकारियां दे देते हैं और अगले कुछ क्षणों में उनके खाते से रकम निकल जाने संबंधी मैसेज उनके मोबाइल पर आने लगता है।
- फेसबुक या ईमेल अकाउंट हैक कर लिया जाता है। इसके बाद उसके दोस्तों को मैसेज कर कहा जाता है कि वह बहुत परेशानी में है। उसे आर्थिक मदद की आवश्यकता है। किसी बैंक खाते में दोस्तों से रुपये मंगवाए जाते हैं। फरीदाबाद की साइबर अपराध शाखा पिछले दिनों इस तरह के एक गिरोह को पकड़ चुकी है।
- मोबाइल सिम हैक करके ई वॉलेट या इंटरनेट बैंङ्क्षकग के माध्यम से खाता साफ होता है।

झारखंड या बिहार से ऑपरेट हो रहे गैंग
साइबर ठगी के मामलों की जांच के लिए साइबर अपराध शाखा का गठन किया गया है। जांच के दौरान लगभग सभी मामलों में यह पता चल जाता है कि अपराध कहां से किया गया है। अधिकतर मामले झारखंड या बिहार के नक्सल प्रभावित जिलों में बैठकर किए जाते हैं। कुछ मामले उड़ीसा से भी होते हैं।

अधिकतर वारदातों में ठगी की रकम 20 हजार से एक लाख रुपये तक होती है। अगर पुलिस अपराधियों को पकडने के लिए जाल बिछाए और वहां तक जाए तो इससे ज्यादा रकम पुलिस के आने-जाने में खर्च हो जाएगी।

वहीं इन जगहों पर जाने में जान का भी जोखिम होता है। यह भी पक्का नहीं होता कि वहां जाकर अपराधी हत्थे चढ़ ही जाएगा। ऐसे में पुलिस कदम पीछे खींच लेती है। जिससे सबकुछ जानकारी होने के बावजूद भी मामले अनसुलझे रह जाते हैं।

मामला दर्ज करवाने के लिए भी खाने पड़ते हैं धक्के

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साइबर अपराध की शिकायत लेकर जब लोग थाने या चौकी में पहुंचते हैं तो वहां से शिकायत को साइबर अपराध शाखा के पास भेज दिया जाता है। डेढ़ से दो महीने अपराध शाखा यह जांच करती है कि मामला सही है या नहीं।

शिकायत सही पाए जाने पर वापस संबंधित थाने में भेजी जाती है, तब थाना पुलिस मामला दर्ज करती है। इसके बाद फिर जांच के लिए वापस साइबर अपराध शाखा को भेज दिया जाता है। इस तरह कई मामले दर्ज होने में छह महीने लग जाते हैं।

साइबर क्राइम या ठगी से संबंधित हर शिकायत की गहनता से जांच होती है। बड़ी संख्या में मामलों को सुलझाया भी जा रहा है। संसाधनों का अभाव है, मगर फिर भी हमारी टीम भरपूर मेहनत कर रही है।- राजेश कुमार चेची, एसीपी क्राइम

क्या कहते हैं आंकड़े

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शिकायत का प्रकार---कुल संख्या---सुलझाए गए
ऑनलाइन फ्रॉड ट्रांजेक्शन- 274---145
ईमेल आइडी या फेसबुक हैक- 30---11
वॉट्स एप ठगी- 3---1

हाल ही सामने आए मामले
6 दिसंबर : सेक्टर-16 निवासी सुनील कुमार का डेबिट कार्ड उनकी जेब में था और उनके खाते से फ्रांस में 72 हजार रुपये की खरीददारी हो गई।
4 दिसंबर : सेक्टर-7बी निवासी नितिन रस्तोगी के मोबाइल वॉलेट से रुपये ट्रांसफर हो गए।
2 दिसंबर : ग्रेटर फरीदाबाद निवासी अमन सिद्धु के खाते से 10 हजार रुपये निकाल लिए गए।
29 नवंबर : चावला कॉलोनी निवासी शालिनी गुप्ता के खाते से पेटीएम द्वारा नौ हजार रुपये निकाल लिए गए।

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