कैसे रची गई ऑटो परमिट घोटाले की साजिश!
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2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने 45 हजार परमिट के दरवाजे खोले थे। उसमें 35 हजार परमिट तो आवंटित हो गए, लेकिन आरक्षित वर्ग के एससी, एसटी और ओबीसी कोटे के 10 हजार परमिट प्रयास के बाद भी नहीं बंट पाए।
दिसंबर 2014 में सरकार ने कोटे के दस हजार परमिट को सामान्य वर्ग में आवंटित करने का फैसला लिया। इसके लिए 12 जनवरी से 13 फरवरी 2015 के बीच आवेदन मंगाए गए।
परिवहन विभाग को कुल 17,400 आवेदन मिले थे, जिसमें 3,592 आवेदन ऐसे थे, जिसे एक ही आदमी ने दो बार या उससे अधिक बार आवेदन किया था। इस बीच मामला कोर्ट में चला गया।
12 अक्तूबर 2015 को कोर्ट ने इसे सामान्य वर्ग में बांटने की मंजूरी दे दी। सात दिसंबर को परिवहन मंत्री ने फाइल को मंजूरी दी। 21 दिसंबर 2015 से परमिट का एलओआई बांटने का काम शुरू हुआ।
इस नीति के तहत दिए गए परमिट
दरअसल, परमिट बांटने की प्रक्रिया सरकार आवेदनों की संख्या के लिहाज से तय करती है। अगर आवेदन परमिट संख्या से अधिक आए हैं तो ड्रॉ के जरिए परमिट बांटा जाता है।
मगर पहले चरण में 12 से 27 जनवरी 2015 के बीच दस हजार परमिट के लिए कुल 13442 आवेदन मिले। जिसमें 3592 आवेदन दो बार हुए थे।
इस तरह कुल 9850 आवेदन ही सही पाए गए। जिसके चलते दूसरे चरण में फिर 28 जनवरी से 13 फरवरी के बीच आवेदन मंगाए गए। उसमें भी इन्हें पांच हजार से अधिक आवेदन मिले।
पहले चरण में आए आवेदनों की संख्या परमिट से कम होने के चलते उन्हें ड्रॉ के बजाए आवेदन के क्रमवार पहले आने वाले को पहले परमिट देने की नीति तय की।
ऐसे किया गया घोटाला
मसलन किसी ने 12 जनवरी को आवेदन किया तो उसे एलओआई पहले जारी होगा। इस तरह अगर किसी ने 15, 16 व 17 जनवरी को किया तो उसका नंबर भी तारीख के क्रमवार आएगा।
यहीं पर गड़बड़ी हो गई। दलालों ने अधिकारियों के साथ मिलकर दूसरे चरण में मसलन 28 फरवरी के बाद आवेदन करने वालों को एलओआई की सूची में ऊपर डालकर एलओआई जारी कर दिया।
जिन्होंने वास्तव में 12 जनवरी को आवेदन किया उसका नाम अभी तक जारी सूची से गायब था। यही नहीं शिकायत को लेकर जांच की गई तो पता चला कि अभी तक जारी 932 परमिट के एलओआई में 32 से 40 फीसदी लोग ऐसे ही हैं। इसमें बहुत से ऐसे है जिनका पता ही नहीं है। इस पूरे खेल में फाइनेंसर भी शामिल हैं।
परमिट आवंटन में लाखों का खेल
परमिट आवंटन में पूरी एक मशीनरी काम कर रही है, जिसमें लाखों रुपये का खेल होता है। जानकारों की माने तो इस पूरे खेल के पीछे फाइनेंसर लगे होते हैं।
वह परमिट को मिलीभगत से हासिल करते हैं फिर किसी दूसरे जरूरतमंद को ब्याज के पैसे के आधार पर बेच देते थे। इससे जितने का परमिट मिलता था उससे डबल पैसा वह कमाता था। एक-एक परमिट के लिए 50 हजार रुपये तक खर्च किया गया है।
सरकार ने तीन लोगों को निलंबित कर सख्त होने का संदेश तो दे दिया, लेकिन इस कार्रवाई पर सवाल भी उठ रहे हैं। दरअसल, सरकार ने ऑटो यूनिट के डिप्टी कमिश्नर, इंस्पेक्टर, यूडीसी पर कार्रवाई तो कर दी है लेकिन ऑटो यूनिट के एमएलओ (मोटर लाइसेंसिग ऑफिसर) पर कार्रवाई नहीं की। जबकि उनकी भी उतनी ही जिम्मेदारी बनती है।
बताया जा रहा है कि वह बीते मंगलवार से छुट्टी पर हैं। ऑटो यूनियन नेता राजेंद्र सोनी ने कहा कि सरकार की यह कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए है। सरकार को एमएलओ समेत उन दलालों को भी गिरफ्तार करना चाहिए जिन्होंने यह पूरा खेल रचा है।