राजधानी में बदला होली खेलने का ट्रेंड, मामूली रंग लगाकर की जाती है रस्म पूरी
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राजधानी निवासियों ने आधुनिकता एवं तरक्की के बीच होली खेलने का ट्रेंड भी बदल दिया है। इस मामले में गांव वाले भी पीछे नहीं रहे है। अब शहर हो या गांव या फिर कालोनी सभी जगह महिलाओं की टोलियां हाथ में कोलड़ा लेकर पुरुषों को मारने के लिए नहीं दौड़ती हैं और न ही होली खेलने के लिए पुरूषों की ओर से आमंत्रित किया जाता है।
अब कुछ देर तक घरों में ही एक-दूसरे पर रंग एवं गुलाल लगाकर होली खेलते हैं। इस दौरान घर परिवार के ही लोग उपस्थित रहते हैं। वर्षों पहले फाल्गुन माह शुरू होते ही होली त्यौहार की झलक दिखाई देनी शुरू हो जाती थी।
महिलाएं अपने देवरों को भीगोने का सिलसिला आरंभ कर देती थी। यह सिलसिला होली के दिन तक जारी रहता था। वहीं दुलंडी के दिन पूरे गांवों की महिलाएं एवं पुरूष टोलियों में होली खेलने के लिए तालाब के पास पहुंचते थे।
इसी बीच जल बोर्ड की ओर से घरों में पानी की आपूर्ति शुरू करने के चलते उन्होंने अपने मोहल्ले में होली खेलनी आरंभ कर दिया। इस दौरान महिलाओं पर पुरूष पानी डालते थे और महिलाएं उनको कोलड़ा मारती थी।
आधुनिकता के चमक में फीका हुआ त्यौहार
मगर अब यह दृश्य गांवों में देखने को नहीं मिलता है। शहर में ऐसे दृश्य की उम्मीद करना बेमानी होगा। बाहरी दिल्ली के कराला गांव निवासी हरीराम माथुर बताते है कि संपन्नता एवं आधुनिकता की चमक दमक के बीच गांवों में होली त्यौहार भी गुम हो चुका है।
फाल्गुन आने और जाने के बारे में मालूम नहीं होता, क्योंकि अब पहले की तरह एक माह पहले महिलाएं अपने देवरों पर पानी नहीं डालती है। नांगलोई निवासी युवक राकेश का कहना है कि अब दुलंडी के दिन ही होली की हल्की झलक दिखाई देती है।
इस दिन लोग घरों के अंदर ही कुछ पल के लिए होली खेलते है। इस दौरान महिलाएं पुरूषों को कोलड़ा मारने की बजाए उन पर रंग एवं गुलाल लगाती है और पुरूष भी महिलाओं पर पानी डालने के बजाए रंग और गुलाल लगाते है।
कुछ महिलाएं व पुरूष होली खेलने की रस्म पूरी करने के लिए केवल हाथ पर गुलाल लगाते है। आधुनिकता के दौर में होली खेलने का ढंग भी लोगों ने अपने मनमाफिक बना लिया है। जबकि पहले रंग और गुलाल होली पर उपयोग नहीं होता था।