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जघन्य अपराधों की सुनवाई दंडाधिकारी के बजाय सेशन जज से कराने की याचिका पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

Wed, 08 May 2019 06:37 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Wed, 08 May 2019 06:37 AM IST
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High Court responds on petition to seek trial of heinous crimes sessions judge instead of magistrate
Delhi high-court - फोटो : फाइल फोटो

दिल्ली हाईकोर्ट ने अप्राकृतिक यौनाचार, भिक्षावृति के लिए नाबालिगों के अपहरण जैसे उम्रकैद की सजा के प्रावधान वाले अपराधों की सुनवाई दंडाधिकारी के बजाय सत्र न्यायाधीश से कराने की याचिका पर केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा विधि एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया है कि दंडाधिकारी महज तीन साल तक सजा वाले मामलों की सुनवाई कर सकते हैं।

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न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनु मल्होत्रा की खंडपीठ ने मंगलवार को सामाजिक कार्यकर्ता एवं वकील अमित साहनी की इस याचिका पर संज्ञान लिया। अगली सुनवाई 16 जुलाई को तय की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की अनुसूची एक भारतीय दंड संहिता की धारा 326 (खतरनाक हथियार या साधन से जानबूझकर गंभीर जख्म पहुंचाना), 327 (धन ऐंठने के लिए जानबूझकर चोट पहुंचाना या अवैध कृत्य के लिए बाध्य करना), 363ए (भिक्षावृति के लिए नाबालिग के अपहरण एवं उसे अपंग बनाना), 377 (अप्राकृतिक यौनाचार), 386 (व्यक्ति को मौत का डर दिखाकर पैसा ऐंठना) 392 (डकैती), 409 (जनसेवक द्वारा विश्वासघात) के तहत दंडाधिकारी द्वारा सुनवाई की जाती है तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की दृष्टि से अमान्य है।
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याचिका में कहा गया है कि इन जघन्य अपराधों के लिए दस साल के कारावास से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान है। याचिका में हाईकोर्ट से अपील की गई है कि वह संबंधित अधिकारियों को इस पर विचार करने तथा उनकी सुनवाई प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत के बजाय सत्र अदालत द्वारा किए जाने की व्यवस्था कर कानून में अंतर्निहित खामी को दूर करने के निर्देश दें।

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