सुनपेड़ में मरने के बाद भी जाति के होते हैं खास मायने
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गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय था जब दलित और वाल्मीकियों को अछूत माना जाता था। इन जातियों को सवर्णों के कुएं, चौपाल और शमशान घाट के पास तक जाने की मनाही थी।
उनके कुआं, चौपाल, यहां तक की शमशान घाट भी अलग होते थे। आजादी के बाद सरकार ने सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा देने के संवैधानिक प्रावधान किए।
जातिभेद विरोधी कानून बनाए गए और कभी अछूत कही जाने वाली जातियों को सार्वजनिक संसाधन का इस्तेमाल करने का अधिकार दिया गया।
समय बदलने के साथ कुओं की जगह सरकारी पेयजल आपूर्ति सिस्टम ने ले लिया। चुनाव सुधारों की वजह से चौपाल और पंचायत में भी सभी जातियों की भागीदारी होने लगी। यह बदलाव शमशान घाटों तक नहीं पहुंच सका।
दूसरे गांवों में भी है परंपरा
इतना ही नहीं सभी जातियों के लोग शोक प्रकट करने एक दूसरे के घर जाते हैं, मगर अंतिम संस्कार के लिए एक दूसरे के शमशान घाट में जाने वालों की संख्या न के बराबर ही होती है।
पूर्व सरपंच बिजेंद्र सिंह के मुताबिक यह परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। प्रशासन के पास भी इस संबंध में पूरा रिकार्ड है। लोगों के पास सही गलत का पैमाना नहीं है, वह तो बस पहले से चली आ रही परंपरा को निभा रहे हैं।
केवल सुनपेड़ ही नहीं बल्कि जिले के कुछ और भी गांव ऐसे हैं जहां शमशान घाट अलग हैं। इनमें मिर्जापुर का नाम भी शामिल है। यहां भी हरिजनों के लिए अलग शमशान घाट है।
इसके अलावा जिले में बड़ी संख्या में ऐसे गांव हैं जिनमें सभी जातियों का अंतिम संस्कार एक ही शमशान घाट में होता है। जिले के बड़े गांवों तिगांव, अटाली, दयालपुर, मोहना, छांयसा, फतेहपुर बिल्लौच में अधिक आबादी के कारण शमशानों की संख्या भले दो से तीन तक है मगर वहां जाति के आधार पर शमशान बटे हुए नहीं है।
जातीय आधार पर बने हैं शमशान घाट
कहते हैं कि मौत जाति का भेद नहीं करती, लेकिन सुनपेड़ गांव में मौत के बाद पंचतत्व में विलीन होने के लिए शरीरों को जाति के आधार पर अलग अलग शमशान घाट का रास्ता तय करना पड़ता है।
दरअसल इस गांव में सवर्ण, दलित और वाल्मीकि जातियों के अलग अलग शमशान घाट हैं। जीते जी एक दूसरे के सुख दुख में साथ देने वाले लोग गांव में किसी की मौत होने पर जातिगत कर्मकांडों से जकड़े दिखाई देते हैं।
किसी व्यक्ति के अंतिम संस्कार में दूसरी जाति के लोग शायद ही शामिल होते हों, हालांकि सांत्वना देने की सामाजिक रस्म तो अदा की ही जाती है।
बुजुर्गों का मानना है कि अलग अलग जातियों के शमशान घाट भी शायद गांव जितने ही पुराने हैं। सब को यह तो मालूम है कि गांव में तीन शमशान घाट हैं लेकिन कब अस्तित्व में आए कोई नहीं जानता।