हाईकोर्ट नहीं कर सकती हर मुद्दे और कार्य की निगरानी, कोर्ट ने लगाई फटकार
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राजधानी में चल रहे हर काम अथवा गतिविधि पर हाईकोर्ट निगरानी नहीं रख सकती। अदालत ने बृहस्पतिवार को यह टिप्पणी सात सरकारी कॉलोनियों के मामले में याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाते हुए की। कोर्ट ने दिल्ली सरकार व सरकारी एजेंसियों के आवेदन पर फैसला सुनाते हुए कहा कि पेड़ न काटने की रोक केवल सात सरकारी कॉलोनियों के संबंध में है।
मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन व न्यायमूर्ति वीके राव की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि कोर्ट का चार जुलाई 2018 को दिया आदेश केवल सात सरकारी कालोनियों से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक तक सीमित है। इसके मद्देनजर एनएचएआई, पावर ग्रिड ऑफ इंडिया, दक्षिण नगर निगम व दिल्ली सरकार के आवेदन को स्वीकार करते हुए उन्हें अपने प्रोजेक्ट आगे बढ़ाने की अनुमति देती है।
हाईकोर्ट में आवेदन दायर कर सरकार व एजेंसियों ने कहा कि कोर्ट के चार जुलाई के आदेश के कारण कई प्रोजेक्ट रुक गए हैं। इसलिए इस आदेश को स्पष्ट किया जाए कि इसका प्रभाव कहां तक है।
आवेदन में कई जरूरी प्रोजेक्ट रुकने का दिया था हवाला
हाईकोर्ट ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि मौजूदा जनहित याचिका केवल सात सरकारी कॉलोनियों के प्रोजेक्ट तक सीमित है। इसलिए याचिकाकर्ता हर मुद्दे को इस जनहित याचिका का विषय न बनाए। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने 30 अगस्त को सात सरकारी कॉलोनियों के पुनर्विकास के मामले में यथावत स्थिति बनाए रखने का निर्देश एनबीसीसी को दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण संबंधी एनओसी पर दोबारा विचार नहीं करती, तब तक यथास्थिति बनाई रखी जाए। सरकार ने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए साढ़े 16 हजार पेड़ काटने की अनुमति प्रदान की थी।
दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने एक आवेदन दायर कर कहा था कि ओखला के नजदीक कचरा प्रोसेसिंग प्लांट लगाना है, जिसके लिए 203 पेड़ों को काटना होगा। लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के कारण इसकी अनुमति वन विभाग नहीं दे रहा है।
दूसरी ओर, दिल्ली सरकार ने भी अन्य आवेदन दायर कर कहा कि हाईकोर्ट के 4 जुलाई के आदेश के चलते मेट्रो समेत कई जरूरी प्रोजेक्ट रुक गए हैं। वहीं एनएचआई ने अपने आवेदन में कहा था कि कोर्ट के आदेश के कारण मुकरबा चौक से पानीपत के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग एक के चौड़ीकरण का कार्य रुक गया है।