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Delhi: HC ने खारिज की मौत की सजा पाए दोषी की आरटीआई के तहत जांच अधिकारियों की जानकारी मांगने संबंधी याचिका

Tue, 05 Mar 2024 06:37 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला ब्यूरो, दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 05 Mar 2024 06:37 PM IST
सार

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी व्यक्तिगत प्रकृति की है। याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी उन अधिकारियों के खिलाफ है जो जांच में शामिल थे और जो याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी और दोषसिद्धि से संबंधित अभियोजन को मंजूरी देने में भी शामिल थे।

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HC rejects death row convict plea seeking information from investigating officers under RTI in Delhi
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में मौत की सजा पाए दोषी एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें आरटीआई अधिनियम के तहत उन अधिकारियों के बारे में जानकारी भी मांगी थी जिन्होंने मामले की जांच की थी और उसकी गिरफ्तारी की मंजूरी दी थी। 

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याचिकाकर्ता एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी को 7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोटों में शामिल होने के लिए अक्टूबर 2015 में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत एक विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। वह फिलहाल नागपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं।

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न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी व्यक्तिगत प्रकृति की है। याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी उन अधिकारियों के खिलाफ है जो जांच में शामिल थे और जो याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी और दोषसिद्धि से संबंधित अभियोजन को मंजूरी देने में भी शामिल थे। जानकारी ऐसी प्रकृति की है, अगर याचिकाकर्ता को दी गई तो ये अधिकारी गंभीर खतरे में पड़ सकते हैं।

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अदालत ने कहा जिस घटना के लिए याचिकाकर्ता को मौत की सजा सुनाई गई है, वह वर्ष 2006 में हुई थी। माना जाता है कि घटना की तारीख के बाद 20 साल नहीं बीते हैं और इसलिए किसी भी स्थिति में वर्तमान मामले के तथ्यों में याचिकाकर्ता को आरटीआई अधिनियम की धारा 8(3) का लाभ उपलब्ध नहीं है। भले ही यह मान लिया जाए कि 20 साल बीत चुके हैं, ऐसे मामलों में इन अधिकारियों के लिए निजता का अधिकार, जिन्हें गंभीर जोखिम में डाला जा सकता है, किसी आरोपी को नहीं दिया जा सकता है और वह भी तब जब आरोपी को दोषी ठहराया गया हो और मौत की सजा सुनाई गई हो। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह दिखाने के लिए कोई मामला नहीं बनाया है कि उसके द्वारा मांगी गई ऐसी कोई भी जानकारी देने से किस सार्वजनिक हित की पूर्ति होगी।

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