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Gurugram News: - मुलायम को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के भागीरथ बने थे ताऊ नेता जी की सियासत के पथ प्रदर्शक रहे हैं ताऊ देवीलाल
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कुमार प्रवीण
गुरुग्राम। देश की सियासत में धरतीपुत्र और नेताजी के नाम से मशहूर हुए मुलायम सिंह यादव ने सियासत का ककहरा भले ही समाजवाद के समर्थक जयप्रकाश नारायण से सीखा हो, लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि उनकी सियासत के पथ प्रदर्शक हरियाणा की सियासत के स्तंभ एवं देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल रहे हैं। नेता जी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में ताऊ के नाम से मशहूर चौधरी देवीलाल ने ही भागीरथ की भूमिका निभाई थी। 5 दिसंबर 1989 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए ताऊ देवीलाल ने ही असली बिसात बिछाई थी। उत्तर प्रदेश के 1988 के विधानसभा चुनाव का हरियाणा से बड़ा रोचक कनेक्शन रहा है। उस चुनाव में चौधरी देवीलाल रथयात्रा लेकर पूरे देश में निकले थे। कानपुर के फूलबाग में भले ही रथयात्रा का समापन था, लेकिन यह रथयात्रा ही मुलायम सिंह को सत्ता के शीर्ष पर ले गई।
समापन अवसर पर ताऊ देवीलाल ने यह कहकर समापन किया कि देश में हमारी क्रांति यात्रा का बेशक समापन हो गया हो, लेकिन उत्तरप्रदेश में यह यात्रा चलती रहेगी। देवीलाल ने ऐलान किया कि इस रथयात्रा की जिम्मेदारी मुलायम सिंह यादव संभालेंगे और यात्रा की कमान उनको सौंप दी। इस यात्रा के माध्यम से मुलायम उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी गहरी पैठ बनाने में कामयाब रहे। इसका सीधा असर विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ और यहां जनता दल (जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल अजीत और लोकदल बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस एस) को जीत मिली। नारायण दत्त तिवारी को हटाकर मुलायम सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने।
ताऊ देवीलाल ने ऐसे बिछाई बिसात
11 अक्टूबर, 1988 को भारतीय राजनीति में एक नई पार्टी का उदय हुआ, जिसका नाम रखा गया जनता दल। इसमें जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल अजित और लोकदल बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस (एस) का विलय किया गया था। 1989 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने थे। तब उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 425 सीटें हुआ करती थीं। कांग्रेस विरोधी लहर में जनता दल ने 356 सीटों पर चुनाव लड़ा और 208 सीटें हासिल की। आईं, जबकि कांग्रेस 410 सीटों पर चुनाव लड़कर 94 सीटें ही जीत पाई। बहुमत किसी के पास नहीं था, लेकिन जनता दल सबसे बड़ी पार्टी थी। उसे सरकार बनाने के लिए कम से कम पांच और विधायकों का समर्थन चाहिए था।
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यहां शुरू हुई जनता दल के नेता की लड़ाई
उत्तर प्रदेश में सरकार गठन से पहले जनता दल में नेता की लड़ाई शुरू हो गई थी। कई दलों के गठबंधन से बने जनता दल में शामिल दल के हर राजनेता की अपनी महत्वकांक्षा थी। गठबंधन दलों की बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के तौर पर चौधरी अजित सिंह के नाम की घोषणा कर दी। मुलायम सिंह यादव का नाम प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के लिए तय किया गया। मुलायम सिंह यादव और चंद्रशेखर ने इसका विरोध किया और ताऊ देवीलाल को उत्तर प्रदेश में जनता दल की जीत का गणित समझाया। ताऊ देवीलाल ने विवाद को खत्म करने के लिए वीपी सिंह को गुप्त मतदान कराने की सलाह दी। बताया जाता है कि ताऊ देवीलाल को नेता से जननेता बने मुलायम सिंह यादव की जीत का पूरा भरोसा था। उनकी सलाह पर वीपी सिंह के तेवर ढीले पड़े और उनको घोषणा करनी पड़ी कि मुख्यमंत्री पद के लिए गुप्त मतदान होगा और जो जीतेगा, वही प्रदेश का मुख्यमंत्री बनेगा। ताऊ की बिछाई बिसात के कारण मुलायम ने डीपी सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा के सहयोग से अजीत सिंह खेमा के 11 विधायक तोड़ लिए। नतीजा आया तो मुलायम सिंह यादव पांच वोटों से विजयी हुए और पहली बार उत्तरप्रदेश के सिंहासन का ताज हासिल किया।
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गुरुग्राम। देश की सियासत में धरतीपुत्र और नेताजी के नाम से मशहूर हुए मुलायम सिंह यादव ने सियासत का ककहरा भले ही समाजवाद के समर्थक जयप्रकाश नारायण से सीखा हो, लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि उनकी सियासत के पथ प्रदर्शक हरियाणा की सियासत के स्तंभ एवं देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल रहे हैं। नेता जी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में ताऊ के नाम से मशहूर चौधरी देवीलाल ने ही भागीरथ की भूमिका निभाई थी। 5 दिसंबर 1989 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए ताऊ देवीलाल ने ही असली बिसात बिछाई थी। उत्तर प्रदेश के 1988 के विधानसभा चुनाव का हरियाणा से बड़ा रोचक कनेक्शन रहा है। उस चुनाव में चौधरी देवीलाल रथयात्रा लेकर पूरे देश में निकले थे। कानपुर के फूलबाग में भले ही रथयात्रा का समापन था, लेकिन यह रथयात्रा ही मुलायम सिंह को सत्ता के शीर्ष पर ले गई।
समापन अवसर पर ताऊ देवीलाल ने यह कहकर समापन किया कि देश में हमारी क्रांति यात्रा का बेशक समापन हो गया हो, लेकिन उत्तरप्रदेश में यह यात्रा चलती रहेगी। देवीलाल ने ऐलान किया कि इस रथयात्रा की जिम्मेदारी मुलायम सिंह यादव संभालेंगे और यात्रा की कमान उनको सौंप दी। इस यात्रा के माध्यम से मुलायम उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी गहरी पैठ बनाने में कामयाब रहे। इसका सीधा असर विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ और यहां जनता दल (जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल अजीत और लोकदल बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस एस) को जीत मिली। नारायण दत्त तिवारी को हटाकर मुलायम सिंह पहली बार मुख्यमंत्री बने।
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ताऊ देवीलाल ने ऐसे बिछाई बिसात
11 अक्टूबर, 1988 को भारतीय राजनीति में एक नई पार्टी का उदय हुआ, जिसका नाम रखा गया जनता दल। इसमें जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल अजित और लोकदल बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस (एस) का विलय किया गया था। 1989 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने थे। तब उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 425 सीटें हुआ करती थीं। कांग्रेस विरोधी लहर में जनता दल ने 356 सीटों पर चुनाव लड़ा और 208 सीटें हासिल की। आईं, जबकि कांग्रेस 410 सीटों पर चुनाव लड़कर 94 सीटें ही जीत पाई। बहुमत किसी के पास नहीं था, लेकिन जनता दल सबसे बड़ी पार्टी थी। उसे सरकार बनाने के लिए कम से कम पांच और विधायकों का समर्थन चाहिए था।
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यहां शुरू हुई जनता दल के नेता की लड़ाई
उत्तर प्रदेश में सरकार गठन से पहले जनता दल में नेता की लड़ाई शुरू हो गई थी। कई दलों के गठबंधन से बने जनता दल में शामिल दल के हर राजनेता की अपनी महत्वकांक्षा थी। गठबंधन दलों की बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के तौर पर चौधरी अजित सिंह के नाम की घोषणा कर दी। मुलायम सिंह यादव का नाम प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के लिए तय किया गया। मुलायम सिंह यादव और चंद्रशेखर ने इसका विरोध किया और ताऊ देवीलाल को उत्तर प्रदेश में जनता दल की जीत का गणित समझाया। ताऊ देवीलाल ने विवाद को खत्म करने के लिए वीपी सिंह को गुप्त मतदान कराने की सलाह दी। बताया जाता है कि ताऊ देवीलाल को नेता से जननेता बने मुलायम सिंह यादव की जीत का पूरा भरोसा था। उनकी सलाह पर वीपी सिंह के तेवर ढीले पड़े और उनको घोषणा करनी पड़ी कि मुख्यमंत्री पद के लिए गुप्त मतदान होगा और जो जीतेगा, वही प्रदेश का मुख्यमंत्री बनेगा। ताऊ की बिछाई बिसात के कारण मुलायम ने डीपी सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा के सहयोग से अजीत सिंह खेमा के 11 विधायक तोड़ लिए। नतीजा आया तो मुलायम सिंह यादव पांच वोटों से विजयी हुए और पहली बार उत्तरप्रदेश के सिंहासन का ताज हासिल किया।