सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्चे, संवार रहे दूसरों की जिंदगी
ज्योति एक ऐसी लड़की जो पहले एक भिखारी थी और अब वो ऐसे अनोखे सर्वे टीम की सदस्य है जो दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में सड़कों पर रहने वाले और काम करने वाले बच्चों की गिनती कर रहे हैं। ज्योति और उसके जैसे अन्य युवा इस इस काम में लगे हैं ताकि इस सर्वे से जो परिणाम निकले वो सड़कों पर रहने वाले बच्चों की स्थिति सुधारने में मदद कर सके।
इस सर्वे ने अब तक 400 ऐसे बच्चों की गिनती कर ली है जो सड़कों पर रहने के साथ ही काम भी करते हैं। कहा ये भी जा रहा है कि इस महीने के अंत तक ये सर्वे पूरा कर लिया जाएगा। सर्वे कर्ताओं के अनुसार वो कम से कम और 400 बच्चों की गिनती कर लेंगे।
16 वर्षीय ज्योति सर्वे टीम बढ़ते कदम के लिए काम करती है। बढ़ते कदम एक ऐसा फेडरेशन है जो सड़कों पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी कैसी बीत रही है ये आंकलन करते हैं। इस सर्वे में वो बच्चे शामिल होते हैं जिन्होंने अनगिनत दिन भीख मांगकर, कचरा बिनकर और बाल मजदूरी करते हुए बिता दी है।
पहले करती थी घरों में काम अब कर रही ग्रैजुएशन
गौरतलब है कि बढ़ते कदम के साथ जुड़ चुकी ज्योति ने अपना काफी समय निजामुद्दीन में भीख मांगकर गुजारा है, जब तक कि चेतना नाम की एनजीओ ने उसे पुनर्वासित नहीं किया। आज ज्योति एक स्थानीय स्कूल में कक्षा दसवीं में पढ़ती है।
एक अन्य लड़की शन्नो जिसने घर के काम करके अपना बचपन बिता दिया उसने ये काम छोड़ दिया और अब 19 साल की शन्नो सामाजिक कार्य से ग्रैजुएशन कर रही है। शन्नो सर्वे टीम के लिए डाटा को इकट्ठा करने का काम करती है। चांदनी नाम की 18 वर्षीय लड़की का भी बीता हुआ कल काफी दुखभरा रहा है जिसे एनजीओ ने भुलाने में और लाइफ में आगे जाने में मदद की है।
बढ़ते कदम द्वारा किए जा रहे अब तक के सर्वे में ये बात निकलकर आई है कि सड़क पर रहने को मजबूर होने वाले बच्चों के लिए काफी हद तक बाबूशाही जिम्मेदार है। स्कूल तो बहुत दूर की बात है। इनमें से अधिकतर बच्चों को जिंदा रहने के लिए मजबूरन मजदूरी करनी पड़ती है।
केजरीवाल सरकार से है इन बच्चों को उम्मीद
शन्नो कहती है कि आम आदमी पार्टी की सरकार को इन बच्चों के साथ मिलकर काम करना होगा ताकि इनके लिए शहर को सुरक्षित बनाया जा सके। शन्नो ने कहा कि उसने डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया द्वारा आयोजित एक बैठक में भाग लिया था।
इस बैठक में सिसोदिया ने महिलाओं की सुरक्षा के बारे में बात की थी और तब उन्होंने कहा था कि इस विषय में उन्होंने स्कूल के बच्चों से भी राय ली है। इसी के बाद शन्नो को लगा था कि सरकार को इसी तरह की बातचीत हमेशा हाशिये पर रहने वाले स्ट्रीट किड्स से भी करनी चाहिए।
बढ़ते कदम की राष्ट्रिय सचिव ज्योति ने बताया कि ये सर्वे काफी मुश्किल था क्योंकि इससे जुड़े कोई भी सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
इस खास धागे से होती है बच्चों की पहचान
ज्योति बताती है कि वो अपने परिवार के साथ बेघरों के लिए बनाए गए बसेरे में रहती है। वहां कम से कम 30 ऐसे बच्चे हैं जो अकेले रहते हैं। वो कहती है कि उनका फोकस यही है कि वो कुछ ऐसा कर सकें जिससे ऐसे अकेले रह रहे बच्चों के जीवन में कुछ बदलाव लाया जा सके।
हालांकि सड़कों के किनारे काम करने और रहने वाले बच्चों को उनके मालिकों से कई तरह की धमकियां मिलती रहती हैं लेकिन सर्वेक्षणकर्ताओं ने इनसे जानकारी लेने में काफी सतर्कता बरती है। सर्वे करने वाले लोग बच्चों से उनकी उम्र, गांव और वो दिल्ली में कहां रहते हैं व क्या करते हैं जैसी जानकारियां लेते हैं।
एक ही बच्चे की कई बार गिनती ना हो इसके लिए सर्वे के दौरान बच्चों के हाथ पर एक खास तरह का धागा बांध दिया जाता है व उनसे पूरी डीटेल ली जाती है। कलाई में धागा बांधने के पीछे केवल बच्चों की गिनती ही नहीं उनसे दोस्ती करने की भी भावना छिपी है जो इन बच्चों की जिंदगी से काफी महरूम रहे हैं।
(साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया)