पांच सालों में खत्म हो जाएगा ये 'कलंक का पहाड़', कचरे से बनेगा राष्ट्रीय राजमार्ग 24
- गाजीपुर लैंडफिल साइट पर जल्द ही 12 मशीनें कूड़े को मिट्टी में बदलने का करेंगी काम,
- अगले पांच सालों में जगह को पूरी तरह समतल करने का लक्ष्य, इस समय लगभग 140 लाख टन का कचरा मौजूद
- पूर्वी दिल्ली से रोज निकलता है 20 हजार मीट्रिक टन कूड़ा, 24 हजार मीट्रिक टन को रोज मिट्टी में बदलने का होगा काम
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पहाड़ किसी भी जगह की खूबसूरती होते हैं और स्थानीय निवासी इन पर हमेशा गर्व करते हैं, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के गाजीपुर में 'कूड़े का पहाड़' इकट्ठा हो गया है, जो यहां के निवासियों के लिए शर्म और परेशानी का सबब बन गया है। कूड़े के इस ढेर की बदबू के कारण इसके आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों का जीवन दूभर हो गया है।
इस परेशानी को देखते हुए प्रशासन कूड़े को आधुनिक मशीनों के जरिए मिट्टी में बदलने का काम कर रहा है और इस तरह पहाड़ की ऊंचाई कम करने की कोशिश की जा रही है। पूर्वी दिल्ली के सांसद गौतम गंभीर का दावा है कि पिछले एक साल में इस पहाड़ की ऊंचाई 40 फीट तक कम कर दी गई है। अधिकारियों का दावा है कि आने वाले 5 साल में इसे हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक, गाजीपुर लैंडफिल साइट से निकलने वाले निस्तारित कचरे को राष्ट्रीय राजमार्ग-24 में सड़क बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसको लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय और पूर्वी दिल्ली नगर निगम में बातचीत चल रही है। अगर सहमती बनी तो जल्दी ही गाजीपुर के कचरे से एनएच-24 को बनाने पर मुहर लग सकती है।
इसके पूर्व एक बार इस मुद्दे पर दोनों पक्ष सहमति के करीब पहुंच गए थे, लेकिन कचरे का निस्तारण कौन करेगा, इस मुद्दे पर आकर बात रुक गई थी। लेकिन अब पूर्वी दिल्ली नगर निगम कचरे को निस्तारित करने के लिए तैयार हो गया है और इसे लेकर कामकाज शुरू भी हो चुका है, अधिकारियों को उम्मीद है कि कचरे से सड़क बनाने के प्रस्ताव पर अब औपचारिक मुहर लग सकती है।
कैसे हो रहा काम
इंदौर नगर निगम प्रशासन ने अपने यहां कूड़े के ढेर को खत्म करने के लिए उल्लेखनीय काम किया था। उसी मॉडल से सीख लेते हुए पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने सितंबर 2019 में विशेष मशीनों का निर्माण कराया।
इन मशीनों में कचरे के सेग्रेगेशन (अलगाव, छंटनी) का काम किया जाता है। उसके बाद इसे बारीक़ मिट्टी में बदलने का काम किया जाता है। इस काम को सांसद गौतम गंभीर, तत्कालीन स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन संदीप कपूर और मेयर अंजू कमलकांत ने शुरू कराया था।
कुल कूड़े में लगभग 20 फीसदी प्लास्टिक और कपड़ा निकलता है, जिसे छंटाई के बाद बिजली बनाने के काम में लाया जा रहा है। 20 फीसदी के करीब मिट्टी, पत्थर और कंक्रीट निकलता है जिसे बारीक कर उससे टाइल्स बनाई जा रही हैं। शेष को मिट्टी में तब्दील कर उसे खाली गड्ढे की जगह भरने के काम में लगाया जा रहा है।
गाजीपुर लैंडफिल साइट में इस समय तीन मशीनों की एक यूनिट लगाई गई है। इसमें पहली और दूसरी मशीन में कचरे की छंटनी कर उसे 30 मिमी मोटाई की मिट्टी में तब्दील कर दिया जाता है। इसके बाद तीसरी मशीन में इसे और बारीक कर 6 मिमी मोटाई की काली मिट्टी में तब्दील कर दिया जाता है।
एक यूनिट एक दिन में 6000 मीट्रिक टन कचरे को निस्तारित कर रही है। आने वाले समय में इसी प्रकार की तीन मशीनें और लगाई जाएंगी। इसके बाद सभी चार यूनिट के जरिए प्रतिदिन 24000 मीट्रिक टन कचरे का निस्तारण किया जाएगा।
पूर्वी दिल्ली से रोजाना लगभग 20 हजार मीट्रिक टन कचरा निकलता है। प्रशासन एक तरफ तो इस रोज निकलने वाले कूड़े को सीमित करना चाहता है और दूसरी तरफ 'कूड़े के पहाड़' के कचरे के निबटान का काम कर रहा है। प्रशासन को उम्मीद है कि अगले पांच सालों में पूरा निबटान कर दिया जाएगा।
कूड़े से बनी यह काली मिट्टी नगर निगम द्वारा मुफ्त में लोगों को उपलब्ध कराई जाती है। इसे पार्कों या किसी भी जगह पर गड्ढे में मिट्टी भरने के काम आ सकता है। नगर निगम का दावा है कि लैब से यह प्रमाणित हो चुका है कि यह मिट्टी जहरीले हानिकारक रसायनों से पूरी तरह मुक्त होती है और इसे कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है और इससे किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होता है।
निगम पर 72 लाख रुपये महीने का खर्च
कचरे के पहाड़ को मिट्टी में तब्दील करने के लिए पूर्वी दिल्ली नगर निगम को प्रति माह भारी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। एक मशीन के लिए उसे प्राइवेट कंपनी को प्रति माह 6 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है।
इस प्रकार आने वाले समय में 12 मशीनों के लिए उसे प्रति माह 72 लाख रुपये खर्च करना पड़ेगा। इसमें मशीन के साथ काम करने वाले इंजिनियर का वेतन भी शामिल है। बिजली पर आये खर्च का भुगतान निगम स्वयं करता है।