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परिषदीय विद्यालयः पानी न शौचालय
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Wed, 30 Nov 2016 01:05 AM IST
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स्कूल
- फोटो : अमर उजाला
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स्मार्ट सिटी की दौड़ में शामिल गाजियाबाद के परिषदीय विद्यालयों की हालत बद से भी बदतर है। कहीं स्कूल भवन के नाम पर चार-चार फीट की चहारदीवारी है, तो कहीं क्लास के नाम पर नीम के पेड़ की छांव।
जर्जर हो चुके भवन से जहां अनहोनी का खतरा हर पल बच्चों के सिर पर मंडराता है, वहां भी क्लास लगाई जा रही है। कहीं किसी स्कूल की पांचों कक्षाओं को एक ही शिक्षक संभाले हुए हैं तो कहीं खानापूर्ति के नाम पर सिर्फ पांच बच्चों को ही पढ़ाया जा रहा है।
पीने के पानी और शौचालय की सुविधा भी ज्यादातर स्कूलों में नहीं है। परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा की स्थिति पर सरकार किस कदर गंभीर है, इसका पता सिर्फ इसी बात से लग जाता है कि आधा शैक्षिक सत्र बीत जाने के बावजूद अभी तक बच्चों को पूरी किताबें भी नहीं मिल सकी हैं।
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स्कूल नंबर-1
एक शिक्षिका चलाती हैं पांच क्लास
गांधी नगर प्राथमिक विद्यालय में पांच अलग-अलग क्लास में बैठे बच्चों को एक ही शिक्षा मित्र चला रही थीं। वे कक्षा चार में बच्चों की कापियां चेक कर रही थीं और अन्य क्लास में एक-एक बच्चे अन्य बच्चों की क्लास लगा रहे थे।
शिक्षा मित्र शकुंतला ने बताया कि पिछले दिनों उनकी मदद के लिए शिक्षक मयंक सिन्हा को लगाया गया था। उनकी भी बीएलओ ड्यूटी लगा दी गई। स्कूल के एक शिक्षक नित्यानंद शर्मा की वर्ष 2011 में ही राजकीय पुस्तकालय में ड्यूटी लगा दी गई है। ऐसे में यह स्कूल फिलहाल एक शिक्षा मित्र के ही भरोसे संचालित है।
स्कूल नंबर-2:
जर्जर इमारत में चल रही क्लास
गांधी नगर स्थित ही उच्च प्राथमिक विद्यालय की जर्जर इमारत में बच्चों की क्लास लगाई जा रही थी। लंच के दौरान बच्चे जिस बरामदे में खडे़ थे, उसकी छत से निकले सरिये साफ नजर आ रहे थे। जर्जर हो चुकी इमारत कब गिर जाए कुछ पता नहीं।
स्कूल नंबर-3
नीम की छांव में लग रही क्लास
प्राथमिक विद्यालय कैला जनरल-2 आठ फीट की चारदीवार के अंदर एक नीम का पेड़ और उसकी छांव में फटी हुई टाट-पट्टी बिछाकर बैठे करीब 35-40 बच्चों को शिक्षिका सुदेश चौहान पढ़ा रही थी।
यहां विद्यालय भवन के नाम पर महज चहारदीवारी और एक स्टोर रूम है। शौचालय के नाम पर चार फीट की दीवार एक कोने में खड़ी है। ऐसे में शिक्षिकाएं और छात्राएं आस-पास के घरों के शौचालयों का प्रयोग करती हैं।
स्कूल नंबर-4
स्कूल के सामने कूड़े का अंबार
डूंडाहेड़ा प्राथमिक विद्यालय के सामने कूड़े का अंबार लगा हुआ है। स्थानीय लोग ही स्कूल के सामने कूड़ा डालते हैं। स्कूल का हैंडपंप भी खराब पड़ा है। पानी पीने के लिए बच्चे पास के ही एक दूसरे स्कूल में जाते हैं। वहां भी लटक-लटक कर हैंडपंप चलाते हैं, तब कहीं जाकर पानी पी पाते हैं।
स्कूल नंबर - 5
सीनियर लगाती हैं जूनियर की क्लास
माता कालोनी प्राथमिक विद्यालय में भी बीएलओ ड्यूटी में शिक्षकों के लगने से एक ही शिक्षिका स्कूल चला रही हैं। यहां सीनियर क्लास की छात्राओं द्वारा जूनियर क्लास के बच्चों को पढ़ाया जाता है।
हो चुकी हैं अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं, नहीं आईं किताबें:
प्राइमरी स्कूलों में बच्चों को सरकार की ओर से किताबें निशुल्क दी जाती हैं। गाजियाबाद में यह व्यवस्था भी बदहाल है। हालत यह है कि यहां प्राइमरी और जूनियर की अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं भी हो चुकी हैं, मगर अभी भी कई विषयों की किताबें ऐसी हैं, जोकि बच्चों को मिली ही नहीं हैं।
कक्षा-5 की सामाजिक विज्ञान, जूनियर में संस्कृत, हमारा परिवेश, पर्यावरण और स्काउट गाइड की किताबें अभी तक बच्चों को उपलब्ध नहीं हैं।
‘स्कूलों में शौचालय और पानी की व्यवस्था के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। जल्द ही इससे स्वीकृति मिलने की उम्मीद है। जहां तक किताबों की बात है प्रदेश स्तर पर ही अभी कुछ विषयों की किताबें नहीं मिल सकी हैं। इसके लिए भी शासन से पत्राचार किया गया है।’ - लालजी यादव, बीएसए।
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जर्जर हो चुके भवन से जहां अनहोनी का खतरा हर पल बच्चों के सिर पर मंडराता है, वहां भी क्लास लगाई जा रही है। कहीं किसी स्कूल की पांचों कक्षाओं को एक ही शिक्षक संभाले हुए हैं तो कहीं खानापूर्ति के नाम पर सिर्फ पांच बच्चों को ही पढ़ाया जा रहा है।
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पीने के पानी और शौचालय की सुविधा भी ज्यादातर स्कूलों में नहीं है। परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा की स्थिति पर सरकार किस कदर गंभीर है, इसका पता सिर्फ इसी बात से लग जाता है कि आधा शैक्षिक सत्र बीत जाने के बावजूद अभी तक बच्चों को पूरी किताबें भी नहीं मिल सकी हैं।
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स्कूल नंबर-1
एक शिक्षिका चलाती हैं पांच क्लास
गांधी नगर प्राथमिक विद्यालय में पांच अलग-अलग क्लास में बैठे बच्चों को एक ही शिक्षा मित्र चला रही थीं। वे कक्षा चार में बच्चों की कापियां चेक कर रही थीं और अन्य क्लास में एक-एक बच्चे अन्य बच्चों की क्लास लगा रहे थे।
शिक्षा मित्र शकुंतला ने बताया कि पिछले दिनों उनकी मदद के लिए शिक्षक मयंक सिन्हा को लगाया गया था। उनकी भी बीएलओ ड्यूटी लगा दी गई। स्कूल के एक शिक्षक नित्यानंद शर्मा की वर्ष 2011 में ही राजकीय पुस्तकालय में ड्यूटी लगा दी गई है। ऐसे में यह स्कूल फिलहाल एक शिक्षा मित्र के ही भरोसे संचालित है।
स्कूल नंबर-2:
जर्जर इमारत में चल रही क्लास
गांधी नगर स्थित ही उच्च प्राथमिक विद्यालय की जर्जर इमारत में बच्चों की क्लास लगाई जा रही थी। लंच के दौरान बच्चे जिस बरामदे में खडे़ थे, उसकी छत से निकले सरिये साफ नजर आ रहे थे। जर्जर हो चुकी इमारत कब गिर जाए कुछ पता नहीं।
स्कूल नंबर-3
नीम की छांव में लग रही क्लास
प्राथमिक विद्यालय कैला जनरल-2 आठ फीट की चारदीवार के अंदर एक नीम का पेड़ और उसकी छांव में फटी हुई टाट-पट्टी बिछाकर बैठे करीब 35-40 बच्चों को शिक्षिका सुदेश चौहान पढ़ा रही थी।
यहां विद्यालय भवन के नाम पर महज चहारदीवारी और एक स्टोर रूम है। शौचालय के नाम पर चार फीट की दीवार एक कोने में खड़ी है। ऐसे में शिक्षिकाएं और छात्राएं आस-पास के घरों के शौचालयों का प्रयोग करती हैं।
स्कूल नंबर-4
स्कूल के सामने कूड़े का अंबार
डूंडाहेड़ा प्राथमिक विद्यालय के सामने कूड़े का अंबार लगा हुआ है। स्थानीय लोग ही स्कूल के सामने कूड़ा डालते हैं। स्कूल का हैंडपंप भी खराब पड़ा है। पानी पीने के लिए बच्चे पास के ही एक दूसरे स्कूल में जाते हैं। वहां भी लटक-लटक कर हैंडपंप चलाते हैं, तब कहीं जाकर पानी पी पाते हैं।
स्कूल नंबर - 5
सीनियर लगाती हैं जूनियर की क्लास
माता कालोनी प्राथमिक विद्यालय में भी बीएलओ ड्यूटी में शिक्षकों के लगने से एक ही शिक्षिका स्कूल चला रही हैं। यहां सीनियर क्लास की छात्राओं द्वारा जूनियर क्लास के बच्चों को पढ़ाया जाता है।
हो चुकी हैं अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं, नहीं आईं किताबें:
प्राइमरी स्कूलों में बच्चों को सरकार की ओर से किताबें निशुल्क दी जाती हैं। गाजियाबाद में यह व्यवस्था भी बदहाल है। हालत यह है कि यहां प्राइमरी और जूनियर की अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं भी हो चुकी हैं, मगर अभी भी कई विषयों की किताबें ऐसी हैं, जोकि बच्चों को मिली ही नहीं हैं।
कक्षा-5 की सामाजिक विज्ञान, जूनियर में संस्कृत, हमारा परिवेश, पर्यावरण और स्काउट गाइड की किताबें अभी तक बच्चों को उपलब्ध नहीं हैं।
‘स्कूलों में शौचालय और पानी की व्यवस्था के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। जल्द ही इससे स्वीकृति मिलने की उम्मीद है। जहां तक किताबों की बात है प्रदेश स्तर पर ही अभी कुछ विषयों की किताबें नहीं मिल सकी हैं। इसके लिए भी शासन से पत्राचार किया गया है।’ - लालजी यादव, बीएसए।