{"_id":"57d70a104f1c1ba73dd47746","slug":"sp-kashyap-s-bad-karma-may-become-generic-alliances","type":"story","status":"publish","title_hn":"बसपा के गले की फांस बन सकता है कश्यप का जातिगत गठजोड़ ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बसपा के गले की फांस बन सकता है कश्यप का जातिगत गठजोड़
ब्यूरो,अमर उजाला गाजियाबाद
Updated Tue, 13 Sep 2016 01:36 AM IST
विज्ञापन
नरेंद्र कश्यप
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पूर्व सांसद नरेंद्र कश्यप बसपा के गले की फांस बन सकते हैं। सूबे की 15 जातियों को एक मंच पर लाकर अपनी ताकत का अहसास कराने वाले कश्यप इसी के चलते मायावती की पसंद बने थे।
अनुसूचित जाति में इनको शामिल करने की लड़ाई लड़ते रहे कश्यप अब 30 सितंबर को कलक्ट्रेट पर धरना देंगे। उनके नाराज समधी हीरालाल कश्यप के साथ आने से ताकत और बढ़ गई है।
नरेंद्र कश्यप बसपा में रहते हुए भी 15 विभिन्न जातियों को एससी में शामिल करने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। वह प्रदेश सरकार से इसका प्रस्ताव भी पास करा चुके हैं। हर साल कश्यप निषाद सम्मेलन में हजारों की भीड़ जुटाकर इस लड़ाई को मजबूत करते रहे हैं।
विज्ञापन
इस जनाधार के सहारे उनको बसपा में ऊंचा पद और राज्यसभा की सदस्यता भी प्राप्त हुई थी। बहू हिमांशी कश्यप की मौत के बाद बसपा से निकाले गए कश्यप अब दोबारा से राजनीतिक धरातल तलाश रहे हैं। नाराज समधी हीरालाल कश्यप के साथ आ जाने से उनकी हालत और मजबूत हो गई है।
30 सितंबर को कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन के दौरान वह अपनी ताकत का राजनीतिक अहसास कराएंगे। ऐसे में बसपा सहित कई राजनीतिक दलों का जनाधार हिलना तय है। दरअसल नरेंद्र कश्यप जिन जातियों के एकमात्र नेता माने जाते हैं, वह बसपा के मतदाता रहे हैं।
नरेंद्र कश्यप के पार्टी से बाहर होने से बसपा को झटका लगना तय है। ऐसे में बसपा उनको पार्टी में लेकर अपने जनाधार को बनाए रखने के चलते दोबारा हाथी की सवारी का मौका दे सकती है। वहीं अन्य राजनीतिक दल भी कश्यप को पार्टी में लेने का दाव आजमा सकती है। हालांकि बसपा जिलाध्यक्ष एड. वीरेंद्र जाटव पार्टी का जनाधार प्रभावित होने से इंकार करते हैं।
क्या हीरालाल करेंगे हत्या के मामले में समझौता
माना जा रहा है कि हिमांशी कश्यप की मौत के बाद आरपार की लड़ाई का एलान कर चुके हीरालाल और नरेंद्र कश्यप अब एक मंच पर आ गए हैं। दोनों की दूरियां कम हुई हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हिमांशी की मौत के मामले भी समझौता हो सकता है। हालांकि सूत्रों का दावा है कि पुलिस भी हिमांशी की मौत के मामले में उनके खिलाफ मजबूत साक्ष्य नहीं जुटा पाई है।
दोनों का ही राजनीतिक कैरियर खा रहा है हिचकोले
एक मंच पर आकर साथ चलना नरेंद्र और हीरालाल कश्यप दोनों के लिए जरूरी है। दरअसल हिमांशी की मौत के बाद से दोनों का राजनीतिक भविष्य ही हिचकोले खा रहा है। ऐसे में समय की नजाकत को समझते हुए, दोनों एक साथ आकर अपनी जातिगत ताकत का अहसास कराकर नया राजनीतिक आधार तलाश सकते हैं।
विज्ञापन
अनुसूचित जाति में इनको शामिल करने की लड़ाई लड़ते रहे कश्यप अब 30 सितंबर को कलक्ट्रेट पर धरना देंगे। उनके नाराज समधी हीरालाल कश्यप के साथ आने से ताकत और बढ़ गई है।
विज्ञापन
नरेंद्र कश्यप बसपा में रहते हुए भी 15 विभिन्न जातियों को एससी में शामिल करने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। वह प्रदेश सरकार से इसका प्रस्ताव भी पास करा चुके हैं। हर साल कश्यप निषाद सम्मेलन में हजारों की भीड़ जुटाकर इस लड़ाई को मजबूत करते रहे हैं।
विज्ञापन
इस जनाधार के सहारे उनको बसपा में ऊंचा पद और राज्यसभा की सदस्यता भी प्राप्त हुई थी। बहू हिमांशी कश्यप की मौत के बाद बसपा से निकाले गए कश्यप अब दोबारा से राजनीतिक धरातल तलाश रहे हैं। नाराज समधी हीरालाल कश्यप के साथ आ जाने से उनकी हालत और मजबूत हो गई है।
30 सितंबर को कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन के दौरान वह अपनी ताकत का राजनीतिक अहसास कराएंगे। ऐसे में बसपा सहित कई राजनीतिक दलों का जनाधार हिलना तय है। दरअसल नरेंद्र कश्यप जिन जातियों के एकमात्र नेता माने जाते हैं, वह बसपा के मतदाता रहे हैं।
नरेंद्र कश्यप के पार्टी से बाहर होने से बसपा को झटका लगना तय है। ऐसे में बसपा उनको पार्टी में लेकर अपने जनाधार को बनाए रखने के चलते दोबारा हाथी की सवारी का मौका दे सकती है। वहीं अन्य राजनीतिक दल भी कश्यप को पार्टी में लेने का दाव आजमा सकती है। हालांकि बसपा जिलाध्यक्ष एड. वीरेंद्र जाटव पार्टी का जनाधार प्रभावित होने से इंकार करते हैं।
क्या हीरालाल करेंगे हत्या के मामले में समझौता
माना जा रहा है कि हिमांशी कश्यप की मौत के बाद आरपार की लड़ाई का एलान कर चुके हीरालाल और नरेंद्र कश्यप अब एक मंच पर आ गए हैं। दोनों की दूरियां कम हुई हैं। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हिमांशी की मौत के मामले भी समझौता हो सकता है। हालांकि सूत्रों का दावा है कि पुलिस भी हिमांशी की मौत के मामले में उनके खिलाफ मजबूत साक्ष्य नहीं जुटा पाई है।
दोनों का ही राजनीतिक कैरियर खा रहा है हिचकोले
एक मंच पर आकर साथ चलना नरेंद्र और हीरालाल कश्यप दोनों के लिए जरूरी है। दरअसल हिमांशी की मौत के बाद से दोनों का राजनीतिक भविष्य ही हिचकोले खा रहा है। ऐसे में समय की नजाकत को समझते हुए, दोनों एक साथ आकर अपनी जातिगत ताकत का अहसास कराकर नया राजनीतिक आधार तलाश सकते हैं।