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प्राइवेट में लगे छह लाख, सरकारी में हुआ निशुल्क इलाज
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प्राइवेट में लगे छह लाख, सरकारी में हुआ निशुल्क इलाज - पैसे खत्म होने पर मां कंगन लेकर पहुंच गई थी अस्पताल आशुतोष यादव गाजियाबाद। कोरोना संक्रमण की चपेट में आने पर मरीज के प्राइवेट अस्पताल में छह लाख रुपये खर्च हो गए, जब आगे के बिल भुगतान करने के लिए पैसे नहीं रहे तो मां अपने बेटे का जीवन बचाने के लिए विरासत में मिले कंगन लेकर अस्पताल पहुंच गई। वहां पता चला कि कंगन देने के बाद भी बिल का पूरा भुगतान नहीं हो पाएगा तो मरीज को अस्पताल प्रबंधन ने संजय नगर अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। वहां पर एक सप्ताह तक निशुल्क इलाज होने के बाद युवक को डिस्चार्ज कर दिया गया। अब वह अपनी नौकरी पर जाने लगे हैं। 32 वर्षीय रवि गर्ग नोएडा में एक निजी कंपनी में जॉब करते हैं। वह एक महीने पहले संक्रमण की चपेट में आ गए तो परिजनों ने उन्हें नेहरू नगर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती किया। वहां पर महज एक सप्ताह में लगभग छह लाख रुपये खर्च हो गए। इसके बावजूद स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा था। आगे के भुगतान के लिए रवि की मां अपना कंगन लेकर अस्पताल पहुंची, लेकिन अग्रिम भुगतान कंगन से मिलने वाली धनराशि से पूरा नहीं हो रहा था तो अस्पताल प्रबंधन ने रवि को सरकारी अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। एक बार को डाक्टर भी हुए परेशान जब मरीज को शिफ्ट किया गया तो एक बार तो मौके पर इलाज कर रही टीम भी परेशान हो गई। इसके बावजूद मरीज का इलाज शुरू किया गया। रात की शिफ्ट में इलाज कर रहे फिजीशियन डा. आरसी गुप्ता और एनेस्थेटिस्ट डा. सुर्यांशु ओझा ने मरीज का इलाज करना एक चैलेंज के रूप में लिया, क्योंकि उस समय सबसे अधिक परेशानी थी कि मरीज की बार-बार आक्सीजन सैचुरेशन कम हो रही थी। एक बार आक्सीजन फ्लक्चुऐट करे तो 96 से तुरंत 90 पर आक्सीजन लेवल पहुंच जाता था। वार्ड में कार्यरत शिवकुमार यादव को बुलाया गया और उन्हें आक्सीजन सप्लाई की जिम्मेदारी दी गई। डाक्टरों ने बताया कि लगातार 18 घंटे शिवकुमार के आक्सीजन पर लगे रहने से मरीज के इलाज में सहूलियत मिली और उसका लेवल बढ़ना शुरू हुआ। एक बार आक्सीजन का स्तर बढ़ा तो वह सामान्य होने लगा और उसे संक्रमण मुक्त होने में दस दिन लगे। डा. आरसी गुप्ता ने बताया कि अधिकांश ऐसे होता है कि मरीज के पास प्राइवेट अस्पताल में देने के लिए पैसा खत्म हो जाता है तो सरकारी में आ जाता था और स्वस्थ होकर जाता था, लेकिन रवि का मामला अलग था, क्योंकि कोरोना संक्रमण के फेफड़े तक पहुंच चुका था। मरीज को गंभीर स्थिति को देखकर स्टाफ भी सकते में था। इसके बावजूद वह स्वस्थ होकर घर गया। रवि ने बातचीत में बताया कि प्राइवेट अस्पताल में जो खर्च लगा था, उसमें से लाखों रुपये मेरी मां ने दिस्तेदारों से कर्ज में लिया है। उन्होंने कहा कि पैसे का कर्ज आज नहीं तो कल उतर जाएगा, लेकिन संयुक्त अस्पताल के डाक्टरों ने जिस लगन से मेरा इलाज करके नया जीवन दिया है, उनका कर्ज नहीं उतारा पाउंगा। उन्होंने बताया कि अब अपने काम की तरफ ध्यान दे रहा हूं। साथ ही यह भी कहा कि मेरे घर के पते का जिक्र न किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो प्लाज्मा दान करने के लिए तैयार हूं, लेकिन उस अस्पताल में दान नहीं करुंगा जहां पर मेरी मां के कंगन बिकने की नौबत आ गई थी। ------------------- आशुतोष यादव
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