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पहलवानी के साथ-साथ मंचन भी करते थे उस्ताद सुल्लामल

Thu, 15 Sep 2016 12:00 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद Updated Thu, 15 Sep 2016 12:00 AM IST
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Maestro also used for wrestling as well as staged Sullaml
अन्य - फोटो : अमर उजाला

शहर में रामलीलाओं के मंचन की तैयारियां शुरू हो गई हैं। गाजियाबाद शहर में चार प्रमुख रामलीलाएं होती हैं। इनमें से सबसे पुरानी सुल्लामल की रामलीला है। इसके अलावा श्री धार्मिक रामलीला समिति कविनगर, श्री रामलीला समिति राजनगर और श्री रामलीला समिति संजयनगर प्रमुख रामलीला समितियां हैं।

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श्री सुल्लामल रामलीला का मंचन घंटाघर स्थित मैदान में किया जाता है। गाजियाबाद के व्यापारी सुल्लामल पहले अखाड़ा चलाते थे। उस्ताद सुल्लामल ने ही सबसे पहले रामलीला का आयोजन शुरू किया। पहलवानी के साथ-साथ मंचन भी लंबे समय तक करते रहे।
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उस्ताद सुल्लामल ने अपने दोस्तों प्यारे लाल, हरिद्वारी लाल, ऋषित चौधरी और पंडित काबुल चंद के साथ मिलकर रामलीला का मंचन शुरू किया। शुरूआत में कलाकार की भूमिका में भी यही लोग रहते थे। सबसे पहले होली वाली गली में रामलीला का मंचन किया जाता था, जिसमें स्थानीय लोग ही कलाकार के रूप में शामिल रहे थे।
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बाद में चौपला मंदिर पर मंचन होना शुरू हुआ। धीरे-धीरे रामलीला मंचन में दर्शकों की भीड़ बढ़ने लगी। एक बार शहर नवाब भी रामलीला का मंचन देखने आए। वहां दर्शकों की भारी भीड़ और छोटी जगह को देखते हुए उन्होंने घंटाघर रामलीला की जमीन रामलीला के लिए दान में दे दी।


सुल्लामल रामलीला समिति से जुड़े उस्ताद अशोक गोयल ने बताया कि जमीन की पक्की रजिस्ट्री के कागज अभी भी मौजूद हैं। उसके बाद धीरे-धीरे स्थानीय कलाकारों की जगह मथुरा की मंडली ने ले ली। अब पिछले 90 साल से मथुरा और वृंदावन के ही कलाकार रामलीला का मंचन करते हैं।

सुल्लामल ने लिखी थी अलग रामलीला
उस्ताद सुल्लामल ने रामलीला मंचन के लिए उस समय खुद से रामलीला मंचन के लिए संवाद लिखे थे। वह रामलीला ‘मुंडी भाषा’ में लिखी गई थी। उन्होंने मंचन के लिए यह रामलीला चार भागों में लिखी थी।


117 सालों से चली आ रही है यह रामलीला
यह रामलीला 117 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। समय के साथ ही रामलीला हर वर्ष और अधिक हाईटेक होती जा रही है। भव्य मंचन के साथ यहां का बड़ा मेला रामलीला के आकर्षण का केंद्र है। राम की बारात और सीता की विदाई के समारोह में पूरा शहर एकजुट हो जाता है। यहां आज भी उस्ताद और चेले की परंपरा जारी है, जो कभी 18वीं सदी में शुरू की गई थी।

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