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काश! ये बुराइयां भी जल जाएं अबके बरस
ब्यूरो,अमर उजाला गाजियाबाद
Updated Mon, 10 Oct 2016 01:16 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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असुरी शक्तियों के खिलाफ भगवान राम अब लंका पर धावा बोलने की तैयारी में हैं। अब न रावण बचेगा और न ही उसकी असुरी सेना। असत्य पर सत्य की जीत होगी और फिर शुरू होगा राम राज।
त्रेतायुग की इस ‘रामलीला’ को बार-बार मंचन के माध्यम से दर्शाया जाता है। बुराइयों के प्रतीक दशकंधर और उसके कुनबे को आग लगाते हैं। दुआ करते हैं कि फिर से वही रामराज आए। पाप, अनाचार, भ्रष्टाचार और ऐसी ही हर मुसीबत का अंत हो।
न समाज में भय हो और न ही कोई जुल्म। सभी के मन में श्रीराम जैसे आदर्श हों। दिलों में मां सीता जैसी निश्छलता, भरत जैसा त्याग और लक्ष्मण जैसा प्रेम हो। समय सत्य और संघर्ष के संकल्प का है। कल दशहरा है। दशानन का संहार होने वाला है।
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बुराई के प्रतीक रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले धू-धूकर जलेंगे। जीत का शोर होगा, विजय पर्व चहुं ओर होगा। हम खुशी मनाएंगे, जश्न मनाएंगे कि रावण मर गया, मगर हकीकत यह है कि समस्याओं का रावण ऐसे ही तड़पाएगा।
बुराइयों का दंश और मुसीबतों का दर्द देगा। बड़ा सवाल यह है कि हर तरफ मौजूद ‘आज का रावण’ खत्म कैसे होगा। अपने शहर को देखो!, यहां मुश्किलों के कैसे ‘दशानन’ बसे हैं। आखिर इनका खात्मा कब होगा?
1. आबोहवा में ‘जहर’: जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण मानकों से कहीं ज्यादा हैं। भूजल भी जहरीला हो गया है। प्रदूषण का आलम यह है कि कभी शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाली हिंडन नदी भी इस कदर मैली हो चुकी है कि उसमें अब जलीय जीव भी बाकी नहीं बचे। भू-जल भी पीने लायक नहीं रह गया है।
2. अपराध पर कसे लगाम: शहर से गांव तक अपराध का बोलबाला है। लूट, हत्या, डकैती यहां आम बात हो गई है। पब्लिक आए दिन सड़कों पर रहती है। दिन हो या रात हर तरफ गुंडे-बदमाशों का बोलबाला है। लोग दहशत में जी रहे हैं। हर कोई चाहता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि बदमाश और अपराध पर पूरी तरह से लगाम कस जाए।
3. हेल्थ को मिले डोज: सरकारी अस्पतालों में उपकरण हैं, मगर डॉक्टर और स्टाफ की कमी के चलते इनका फायदा मरीजों को नहीं मिल पाता। ऐसे में आम जनता महंगा इलाज कराने को मजबूर हैं। मामूली बुखार के लिए भी चंद निजी डॉक्टर और पैथलैब मरीजों की जेब काटते हैं। आवाम अब हेल्थ सेवाओं में सुधार के सपने देख रही है।
4. पब्लिक ट्रांसपोर्ट: दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी बुरा हाल है। मेरठ में सिटी बस सेवा फर्रांटे भर रही हैं और गाजियाबाद में यह सेवा सिर्फ कागजों में ही यात्रियों को ढो रही हैं। ऑटो-टेंपो की सेवा उपलब्ध है, मगर शहर की कई कालोनियों में ऑटो-टेंपो भी नहीं जाते। उलटा ऑटो चालकों द्वारा की गई लूट की कई वारदातों से जनता रात के समय इनमें सफर करते हुए भी डरती है।
5. गंदगी ने किया बदनाम: स्मार्ट सिटी की दौड़ में शामिल गाजियाबाद हर बार गंदगी के चलते इस सूची से बाहर हुआ। नगर निगम अधिकारियों ने लाखों खर्च करके कंसलटेंट फर्म को भी हायर किया, मगर गाजियाबाद स्मार्ट सिटी में अभी तक शामिल नहीं हो सका। नगर निगम का गठन हुए 20 साल से ज्यादा हो चुके हैं, मगर 20 लाख की आबादी वाले इस शहर की सफाई व्यवस्था आज तक बदतर है। सड़कों के किनारे पड़े कूडे़ के ढेर शहर की छवि को बट्टा लगा रहे हैं।
6. सीवर सिस्टम: गाजियाबाद से ट्रांस हिंडन तक शायद ही कोई ऐसी कालोनी है, जहां सीवर सिस्टम टेंशन न दे रहा हो। जनता आए दिन इसके लिए प्रदर्शन करती है अधिकारियों से गुहार लगाती है, मगर अधिकारियों के सिर पर जूं तक नहीं रेंगती। सीवर सुधार की योजनाएं तो बहुत बनाई गईं, मगर कमजोर और हवा-हवाई।
7. जाम का झाम: गाजियाबाद की सबसे बड़ी समस्याओं में ट्रैफिक प्राब्लम भी शामिल है। जाम से हर रोज ही लोगों को दो-चार होना पड़ता है। आए दिन लगने वाले जाम के चलते गाजियाबाद को लोग अब ‘जामनगर’ के नाम से भी पहचानने लगे हैं। अन्य शहर के मुकाबले गाजियाबाद में एक्सीडेंट के आंकडे़ भी ज्यादा हैं। इस वर्ष भी करीब 400 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं।
8. महिला अपराध: महिलाओं के साथ ाअपराध की वारदातें बढ़ रही हैं। शहर में आए दिन होने वाली झपटमारी, लूट और रेप कांड की वारदातों से महिलाएं दहशत में हैं। रेप, दहेज हत्या, स्नैचिंग की वारदातों का ग्राफ हर साल पुलिस रिकार्ड में बढ़ता ही जा रहा है। शहर की महिलाएं चाहती हैं कि उन्हें महिलाओं पर अत्याचार करने वाले इन ‘रावणों’ का भी अंत हो।
9. बाल मजदूरी: विकास के साथ ही गाजियाबाद में बाल मजदूरी को भी बढ़ावा मिला है। हाल ही में हुआ शिक्षा विभाग का हाउस होल्ड सर्वे भी इस बात की पुष्टि करता है। सर्वे बताता है कि गांवों के मुकाबले शहर के स्कूलों में लड़कों की संख्या कम होती है। कारण स्पष्ट है कि 8 से 14 साल तक के बच्चे शहर में पढ़ाई से ज्यादा ढाबों और होटलों आदि में काम करते हैं।
10. गिरता भूजल: गाजियाबाद में पानी की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आबादी बढ़ने की वजह से जमीन के नीचे से पानी को बडे़ स्तर पर खींचा जा रहा है, लेकिन ग्राउंड वाटर रिचार्ज करने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए। शहर की कई कालोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों का ग्राउंड वाटर तो दूषित हो चुका है। खुद जल निगम ने भी अपने कई हैंडपंपों पर चेतावनी के बोर्ड लगा दिए हैं।
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त्रेतायुग की इस ‘रामलीला’ को बार-बार मंचन के माध्यम से दर्शाया जाता है। बुराइयों के प्रतीक दशकंधर और उसके कुनबे को आग लगाते हैं। दुआ करते हैं कि फिर से वही रामराज आए। पाप, अनाचार, भ्रष्टाचार और ऐसी ही हर मुसीबत का अंत हो।
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न समाज में भय हो और न ही कोई जुल्म। सभी के मन में श्रीराम जैसे आदर्श हों। दिलों में मां सीता जैसी निश्छलता, भरत जैसा त्याग और लक्ष्मण जैसा प्रेम हो। समय सत्य और संघर्ष के संकल्प का है। कल दशहरा है। दशानन का संहार होने वाला है।
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बुराई के प्रतीक रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले धू-धूकर जलेंगे। जीत का शोर होगा, विजय पर्व चहुं ओर होगा। हम खुशी मनाएंगे, जश्न मनाएंगे कि रावण मर गया, मगर हकीकत यह है कि समस्याओं का रावण ऐसे ही तड़पाएगा।
बुराइयों का दंश और मुसीबतों का दर्द देगा। बड़ा सवाल यह है कि हर तरफ मौजूद ‘आज का रावण’ खत्म कैसे होगा। अपने शहर को देखो!, यहां मुश्किलों के कैसे ‘दशानन’ बसे हैं। आखिर इनका खात्मा कब होगा?
1. आबोहवा में ‘जहर’: जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण मानकों से कहीं ज्यादा हैं। भूजल भी जहरीला हो गया है। प्रदूषण का आलम यह है कि कभी शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाली हिंडन नदी भी इस कदर मैली हो चुकी है कि उसमें अब जलीय जीव भी बाकी नहीं बचे। भू-जल भी पीने लायक नहीं रह गया है।
2. अपराध पर कसे लगाम: शहर से गांव तक अपराध का बोलबाला है। लूट, हत्या, डकैती यहां आम बात हो गई है। पब्लिक आए दिन सड़कों पर रहती है। दिन हो या रात हर तरफ गुंडे-बदमाशों का बोलबाला है। लोग दहशत में जी रहे हैं। हर कोई चाहता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि बदमाश और अपराध पर पूरी तरह से लगाम कस जाए।
3. हेल्थ को मिले डोज: सरकारी अस्पतालों में उपकरण हैं, मगर डॉक्टर और स्टाफ की कमी के चलते इनका फायदा मरीजों को नहीं मिल पाता। ऐसे में आम जनता महंगा इलाज कराने को मजबूर हैं। मामूली बुखार के लिए भी चंद निजी डॉक्टर और पैथलैब मरीजों की जेब काटते हैं। आवाम अब हेल्थ सेवाओं में सुधार के सपने देख रही है।
4. पब्लिक ट्रांसपोर्ट: दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी बुरा हाल है। मेरठ में सिटी बस सेवा फर्रांटे भर रही हैं और गाजियाबाद में यह सेवा सिर्फ कागजों में ही यात्रियों को ढो रही हैं। ऑटो-टेंपो की सेवा उपलब्ध है, मगर शहर की कई कालोनियों में ऑटो-टेंपो भी नहीं जाते। उलटा ऑटो चालकों द्वारा की गई लूट की कई वारदातों से जनता रात के समय इनमें सफर करते हुए भी डरती है।
5. गंदगी ने किया बदनाम: स्मार्ट सिटी की दौड़ में शामिल गाजियाबाद हर बार गंदगी के चलते इस सूची से बाहर हुआ। नगर निगम अधिकारियों ने लाखों खर्च करके कंसलटेंट फर्म को भी हायर किया, मगर गाजियाबाद स्मार्ट सिटी में अभी तक शामिल नहीं हो सका। नगर निगम का गठन हुए 20 साल से ज्यादा हो चुके हैं, मगर 20 लाख की आबादी वाले इस शहर की सफाई व्यवस्था आज तक बदतर है। सड़कों के किनारे पड़े कूडे़ के ढेर शहर की छवि को बट्टा लगा रहे हैं।
6. सीवर सिस्टम: गाजियाबाद से ट्रांस हिंडन तक शायद ही कोई ऐसी कालोनी है, जहां सीवर सिस्टम टेंशन न दे रहा हो। जनता आए दिन इसके लिए प्रदर्शन करती है अधिकारियों से गुहार लगाती है, मगर अधिकारियों के सिर पर जूं तक नहीं रेंगती। सीवर सुधार की योजनाएं तो बहुत बनाई गईं, मगर कमजोर और हवा-हवाई।
7. जाम का झाम: गाजियाबाद की सबसे बड़ी समस्याओं में ट्रैफिक प्राब्लम भी शामिल है। जाम से हर रोज ही लोगों को दो-चार होना पड़ता है। आए दिन लगने वाले जाम के चलते गाजियाबाद को लोग अब ‘जामनगर’ के नाम से भी पहचानने लगे हैं। अन्य शहर के मुकाबले गाजियाबाद में एक्सीडेंट के आंकडे़ भी ज्यादा हैं। इस वर्ष भी करीब 400 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं।
8. महिला अपराध: महिलाओं के साथ ाअपराध की वारदातें बढ़ रही हैं। शहर में आए दिन होने वाली झपटमारी, लूट और रेप कांड की वारदातों से महिलाएं दहशत में हैं। रेप, दहेज हत्या, स्नैचिंग की वारदातों का ग्राफ हर साल पुलिस रिकार्ड में बढ़ता ही जा रहा है। शहर की महिलाएं चाहती हैं कि उन्हें महिलाओं पर अत्याचार करने वाले इन ‘रावणों’ का भी अंत हो।
9. बाल मजदूरी: विकास के साथ ही गाजियाबाद में बाल मजदूरी को भी बढ़ावा मिला है। हाल ही में हुआ शिक्षा विभाग का हाउस होल्ड सर्वे भी इस बात की पुष्टि करता है। सर्वे बताता है कि गांवों के मुकाबले शहर के स्कूलों में लड़कों की संख्या कम होती है। कारण स्पष्ट है कि 8 से 14 साल तक के बच्चे शहर में पढ़ाई से ज्यादा ढाबों और होटलों आदि में काम करते हैं।
10. गिरता भूजल: गाजियाबाद में पानी की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आबादी बढ़ने की वजह से जमीन के नीचे से पानी को बडे़ स्तर पर खींचा जा रहा है, लेकिन ग्राउंड वाटर रिचार्ज करने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए। शहर की कई कालोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों का ग्राउंड वाटर तो दूषित हो चुका है। खुद जल निगम ने भी अपने कई हैंडपंपों पर चेतावनी के बोर्ड लगा दिए हैं।