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विकास की बलिवेदी पर चढ गई हिंडन
ब्यूरो/अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Thu, 26 May 2016 01:09 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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कभी गाजियाबाद की पहचान और लाइफ लाइन कही जाने वाली हरनंदी नदी (वर्तमान में हिंडन) अब बदहाली पर आंसू बहा रही है। 70 के दशक में दूधेश्वरनाथ मंदिर तक बहने वाली यह नदी अब 50-60 मीटर चौडाई के दायरे में सिमट कर रह गई है।
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कभी विकास के नाम पर तो कभी भूमाफियाओं ने प्लाटिंग के लिए नदी का गला ‘घोंट’ दिया। मौसम विभाग ने इस बार अच्छे मानसून की उम्मीद जताई है। ऐसे में वर्ष 1978 जैसे बाढ़ के हालात बने तो भारी तबाही मच सकती है। नदी के पानी को बहाव के लिए जगह न मिली तो आसपास की कालोनियां जलमग्न हो सकती हैं।
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सहारनपुर से निकलकर हिंडन नदी छह सहायक नदियों (कृष्णा, काली, चेचही, नागदेवी, पांवधोई, धमोला) समेटते हुए गौतमबुद्ध नगर के मोमनाथनपुर में यमुना में जाकर मिल जाती है। हिंडन किनारे बसे गांव मेरठ के आलमगीरपुर और गाजियाबाद के सुठारी में बीते दिनों खुदाई में हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले थे।
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विशेषज्ञों की मानें तो ये अवशेष गवाह हैं कि उस सभ्यता के दौरान भी हिंडन का अलग महत्व रहा होगा। गाजियाबाद के इतिहास में भी हिंडन के रूप में एक खास ‘अध्याय’ जुड़ा है। पूर्व में हिंडन नदी पेयजल और सिंचाई का मुख्य स्रोत था।
करहेड़ा, कनावनी, नूरनगर, सिहानी, प्रहलाद गढ़ी, साहिबाबाद समेत कई गांवों में खेती इसी हिंडन के पानी की वजह से लहलहाती थी। अब सरकारी तंत्र और लोगों की उपेक्षा की वजह से नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। नदी का विराट रूप अब ‘नाले’ जैसा रह गया है।
गाजियाबाद के विकास ने किया नदी का विनाश
शहर के विकास ने हिंडन नदी की ‘बलि’ ली है। चार गेटों के बीच बसे गाजियाबाद को हिंडन नदी के पानी से बचाने के लिए सबसे पहले जीडीए दफ्तर के सामने वाली रोड को पुश्ते के रूप में बनाया गया।
विशेषज्ञों और इतिहासकारों की मानें तो इसके बाद शहर की आबादी बढ़ी तो पटेल नगर, लोहिया नगर बसाकर शिब्बनपुरा में पुश्ता बना दिया गया। इसके बाद मेरठ रोड (वर्तमान में एनएच-58) और फिर राजनगर एक्सटेंशन पुश्ता बनाया गया। नदी के बहाव का रुख मोड़ते-मोड़ते अब राजनगर एक्सटेंशन पुश्ते तक सीमित कर दिया गया।
अब मेट्रो के पिलर खड़े किए जा रहे नदी में
मौजूदा समय में दिलशाद गार्डन-नया बस अड्डा मेट्रो प्रोजेक्ट भी हिंडन के बहाव को रोक रहा है। नदी के बहाव क्षेत्र में मेट्रो के पिलर खड़े किए जा रहे हैं। इन पिलर को खड़े करने के लिए नदी को मिट्टी से पाट कर बहाव मोड़ दिया गया है। जून महीने में बारिश शुरू हो जाएगी। ऐसे में ज्यादा बारिश हुई तो यह मिट्टी भी शहर के लिए खतरनाक हो सकती है।
1978 जैसे हालात अब नहीं झेल पाएगा शहर
हिंडन नदी की चौड़ाई गाजियाबाद से पीछे अभी भी काफी है। इस बार मानसून बीते कई वर्षों से बेहतर रहने का अनुमान है। ऐसे में बारिश 1978 जैसी हुई तो गाजियाबाद में भीषण तबाही हो सकती है।
जानकारों की मानें तो गाजियाबाद में नदी बेहद संकरी हो जाने से पानी आसानी से नहीं निकल पाएगा और बंधे तोड़कर कालोनियों में घुस सकता है। सरकारी तंत्र की लापरवाही का खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ सकता है। - विक्रांत शर्मा, हिंडन जल बिरादरी के संयोजक
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हिंडन में रोजाना जाते थे नहाने
गर्मी के दिनों में नहाने के लिए कोई स्वीमिंग पूल नहीं होता था। हिंडन एकमात्र जगह थी जहां लोग नहाने पहुंचते थे। दोपहर से शाम तक नहाने वालों की यहां भीड़ रहती थी। मैं भी अपने मित्रों के साथ हिंडन में नहाने जाता था।
अब केमिकल और गंदे पानी की वजह से यहां लोगों ने आना-जाना ही छोड़ दिया। इसके लिए सिर्फ सरकारी तंत्र ही नहीं शहर के लोग भी जिम्मेदार हैं। लोग आगे आए तो हिंडन फिर पहले जैसी हो सकती है। - सुरेंद्र प्रकाश गोयल, पूर्व सांसद