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अनुदान लेकर भी नहीं बनाए गए शौचालय
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Sun, 04 Dec 2016 12:46 AM IST
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शौचालय
- फोटो : अमर उजाला
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स्वच्छ भारत मिशन के तहत दो वर्ष पहले बड़का आरिफपुर गांव को शौचालयों के लिए मिले अनुदान का सच घोटाले के रूप में सामने आया गया है। बसंतपुर सैंथली गांव में शौचालय के निर्माण में घोटाला पहले ही सामने आ चुका है।
डीएम के आदेश पर की गई जांच में सब सामने आ गया है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करते हुए पूर्व प्रधान को नोटिस जारी किया गया है। डीपीआरओ वीरेंद्र सिंह यादव ने बताया कि गांव में वर्ष 2013-2014 में ग्राम प्रधान द्वारा बनवाए गए शौचालयों के संबंध में शिकायत मिली थी।
इस दौरान ग्राम प्रधान को 110 शौचालय बनवाने के लिए अनुदान राशि जारी की गई थी। पिछले दिनों ग्राम वासियों और वर्तमान प्रधान द्वारा अनुदान मिलने के बावजूद शौचालयों का निर्माण नहीं कराए जाने की शिकायत की गई।
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जनपद स्तरीय टीम की जांच में सामने आया कि महज 25 शौचालय ही बनाए गए हैं, जबकि 110 शौचालयों की अनुदान राशि पूर्व प्रधान को जारी गई थी। यहां तक कि गांव के कुछ लोगों ने अपने खर्च पर शौचालय भी बनवा लिए हैं लेकिन इन्हें अनुदान राशि पूर्व प्रधान की ओर से दी ही नहीं गई।
डीपीआरओ ने बताया कि वर्ष 2013-2014 में मनरेगा का बजट भी शौचालय बनवाने के लिए जारी किया जाता था। इस मामले में डीएम के आदेश पर पूर्व प्रधान को नोटिस भी जारी कर दिया गया है।
- स्थानीय अधिकार भी हो सकते हैं जिम्मेदार
गौरतलब है कि वर्ष 2013-2014 में बनवाए गए शौचालयों का ऑडिट भी स्थानीय स्तर पर हुआ होगा लेकिन तब घोटाला सामने नहीं आया। तत्काल ऑडिट और अधिकारिक जांच में भी फर्जीवाड़ा का पता नहीं चला। ऐसे में, माना जा रहा है कि स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाला किया गया है। उस दौरान तैनात अधिकारियों की सूची खंगाली जा रही है।
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डीएम के आदेश पर की गई जांच में सब सामने आ गया है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करते हुए पूर्व प्रधान को नोटिस जारी किया गया है। डीपीआरओ वीरेंद्र सिंह यादव ने बताया कि गांव में वर्ष 2013-2014 में ग्राम प्रधान द्वारा बनवाए गए शौचालयों के संबंध में शिकायत मिली थी।
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इस दौरान ग्राम प्रधान को 110 शौचालय बनवाने के लिए अनुदान राशि जारी की गई थी। पिछले दिनों ग्राम वासियों और वर्तमान प्रधान द्वारा अनुदान मिलने के बावजूद शौचालयों का निर्माण नहीं कराए जाने की शिकायत की गई।
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जनपद स्तरीय टीम की जांच में सामने आया कि महज 25 शौचालय ही बनाए गए हैं, जबकि 110 शौचालयों की अनुदान राशि पूर्व प्रधान को जारी गई थी। यहां तक कि गांव के कुछ लोगों ने अपने खर्च पर शौचालय भी बनवा लिए हैं लेकिन इन्हें अनुदान राशि पूर्व प्रधान की ओर से दी ही नहीं गई।
डीपीआरओ ने बताया कि वर्ष 2013-2014 में मनरेगा का बजट भी शौचालय बनवाने के लिए जारी किया जाता था। इस मामले में डीएम के आदेश पर पूर्व प्रधान को नोटिस भी जारी कर दिया गया है।
- स्थानीय अधिकार भी हो सकते हैं जिम्मेदार
गौरतलब है कि वर्ष 2013-2014 में बनवाए गए शौचालयों का ऑडिट भी स्थानीय स्तर पर हुआ होगा लेकिन तब घोटाला सामने नहीं आया। तत्काल ऑडिट और अधिकारिक जांच में भी फर्जीवाड़ा का पता नहीं चला। ऐसे में, माना जा रहा है कि स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाला किया गया है। उस दौरान तैनात अधिकारियों की सूची खंगाली जा रही है।