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समय बचाने के लिए लोगों ने छोड़ी मेट्रो
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समय बचाने के लिए लोगों ने छोड़ी मेट्रो
साहिबाबाद। समय बचाने और जाम से बचने के लिए लोगों ने वर्षों पहले गाड़ी छोड़कर मेट्रो से सफर करना शुरू कर दिया था। अब उन्हीं लोगों ने कोरोना प्रोटोकोल की वजह से मेट्रो के लिए लगने वाली लंबी लाइन से परेशान होकर दोबारा अपनी कार की स्टेयरिंग थाम ली है। जिनके पास कार नहीं वह कैब या अन्य साधनों से जाने को मजबूर हो गए हैं।
मेट्रो स्टेशन में प्रवेश के गर्मी के बीच धूप में घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है। पहले समय से ऑफिस या अन्य जगह पहुंचने के लिए मेट्रो से बेहतर कोई सवारी साधन नहीं था, लेकिन अब मेट्रो के बाहर लाइन में लगने के लिए घर से अतिरिक्त समय लेकर निकलना पड़ता है। इसके बावजूद लोग ऑफिस के लिए लेट हो जाते हैं। ऐसे में टीएचए के बहुत से लोग जो दिल्ली, फरीदाबाद एवं गुरुग्राम जाते हैं, दोबारा अपनी गाड़ियों से जाना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि कोरोना प्रोटोकॉल के नाम पर बहुत अधिक समय स्टेशन पर लग जाता है। ऐसे में मेट्रो की बजाय अपनी गाड़ी और कैब मजबूरी बन गई है। हालांकि पेट्रोल के दाम बढ़ने से लोगों के बीच परेेशानी है, लेकिन समय से ऑफिस पहुंचने के लिए कैब और निजी वाहन का उपयोग करने लगे हैं।
क्या बोले लोग
वैशाली से गुरुग्राम तक का सफर काफी लंबा है। ऐसे में मैं कई वर्षों से मेट्रो से ही सफर करता था। दूसरी लहर के बाद से मेट्रो में प्रोटोकॉल के नाम पर लंबी लाइन में लगना पड़ता है। एक सप्ताह तक मैंने पूरा प्रयास किया और घर से अतिरिक्त समय लेकर चलता था, लेकिन फिर भी ऑफिस के लिए हर रोज लेट हो जाता था। अब कार से जाना शुरू कर दिया है।
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संजीव सक्सेना
मेरा ऑफिस दिल्ली लोक कल्याण मार्ग पर है। मेट्रो से वहां पहुंचने में करीब डेढ़ घंटा लगता था, लेकिन स्टेशन के बाहर लगने वाली लंबी लाइन की वजह से घर से एक घंटा पहले निकलना पड़ता था। इस पर भी चिलचिलाती धूप में खड़े होकर पसीना बहाओ, इससे बेहतर मैंने अपनी गाड़ी से जाना शुरू कर दिया है।
दिनेश शर्मा
अब मेट्रो तक पहुंचने के लिए घंटों धूप में खड़ा होना पड़ता है। इस पर भी आए दिन स्टेशन पर पुलिस की झड़प आदि झेलना पड़ती है। ऐसे में सुबह-सुबह मूड ऑफ हो जाता है। मैंने फिलहाल अपने वाहन से ऑफिस जाना शुरू कर दिया है, जब तक सब सामान्य नहीं हो जाता मेट्रो से सफर नहीं करूंगा।
प्रवीन
मेट्रो से ऑफिस पहुंचने के लिए घर से एक घंटा पहले निकलना पड़ रहा था, बावजूद इसके ऑफिस के लिए देरी हो जाती थी। ऐसे में घर और ऑफिस दोनों ही मैनेज करना मुश्किल हो रहा था। इससे अच्छा मैंने कैब में जाना शुरू कर दिया है, हालांकि इसमें किराया अधिक लगता है लेकिन यह अब मजबूरी है।
अल्पना पाठक
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साहिबाबाद। समय बचाने और जाम से बचने के लिए लोगों ने वर्षों पहले गाड़ी छोड़कर मेट्रो से सफर करना शुरू कर दिया था। अब उन्हीं लोगों ने कोरोना प्रोटोकोल की वजह से मेट्रो के लिए लगने वाली लंबी लाइन से परेशान होकर दोबारा अपनी कार की स्टेयरिंग थाम ली है। जिनके पास कार नहीं वह कैब या अन्य साधनों से जाने को मजबूर हो गए हैं।
मेट्रो स्टेशन में प्रवेश के गर्मी के बीच धूप में घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है। पहले समय से ऑफिस या अन्य जगह पहुंचने के लिए मेट्रो से बेहतर कोई सवारी साधन नहीं था, लेकिन अब मेट्रो के बाहर लाइन में लगने के लिए घर से अतिरिक्त समय लेकर निकलना पड़ता है। इसके बावजूद लोग ऑफिस के लिए लेट हो जाते हैं। ऐसे में टीएचए के बहुत से लोग जो दिल्ली, फरीदाबाद एवं गुरुग्राम जाते हैं, दोबारा अपनी गाड़ियों से जाना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि कोरोना प्रोटोकॉल के नाम पर बहुत अधिक समय स्टेशन पर लग जाता है। ऐसे में मेट्रो की बजाय अपनी गाड़ी और कैब मजबूरी बन गई है। हालांकि पेट्रोल के दाम बढ़ने से लोगों के बीच परेेशानी है, लेकिन समय से ऑफिस पहुंचने के लिए कैब और निजी वाहन का उपयोग करने लगे हैं।
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क्या बोले लोग
वैशाली से गुरुग्राम तक का सफर काफी लंबा है। ऐसे में मैं कई वर्षों से मेट्रो से ही सफर करता था। दूसरी लहर के बाद से मेट्रो में प्रोटोकॉल के नाम पर लंबी लाइन में लगना पड़ता है। एक सप्ताह तक मैंने पूरा प्रयास किया और घर से अतिरिक्त समय लेकर चलता था, लेकिन फिर भी ऑफिस के लिए हर रोज लेट हो जाता था। अब कार से जाना शुरू कर दिया है।
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संजीव सक्सेना
मेरा ऑफिस दिल्ली लोक कल्याण मार्ग पर है। मेट्रो से वहां पहुंचने में करीब डेढ़ घंटा लगता था, लेकिन स्टेशन के बाहर लगने वाली लंबी लाइन की वजह से घर से एक घंटा पहले निकलना पड़ता था। इस पर भी चिलचिलाती धूप में खड़े होकर पसीना बहाओ, इससे बेहतर मैंने अपनी गाड़ी से जाना शुरू कर दिया है।
दिनेश शर्मा
अब मेट्रो तक पहुंचने के लिए घंटों धूप में खड़ा होना पड़ता है। इस पर भी आए दिन स्टेशन पर पुलिस की झड़प आदि झेलना पड़ती है। ऐसे में सुबह-सुबह मूड ऑफ हो जाता है। मैंने फिलहाल अपने वाहन से ऑफिस जाना शुरू कर दिया है, जब तक सब सामान्य नहीं हो जाता मेट्रो से सफर नहीं करूंगा।
प्रवीन
मेट्रो से ऑफिस पहुंचने के लिए घर से एक घंटा पहले निकलना पड़ रहा था, बावजूद इसके ऑफिस के लिए देरी हो जाती थी। ऐसे में घर और ऑफिस दोनों ही मैनेज करना मुश्किल हो रहा था। इससे अच्छा मैंने कैब में जाना शुरू कर दिया है, हालांकि इसमें किराया अधिक लगता है लेकिन यह अब मजबूरी है।
अल्पना पाठक