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30 करोड़ का फर्जीवाड़ा, निजी लोगों के नाम कर दी नगर निगम की सरकारी जमीन
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30 करोड़ का फर्जीवाड़ा, निजी लोगों के नाम कर दी नगर निगम की सरकारी जमीन
गाजियाबाद। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन के घोटाले के बाद अब एक और घोटाला सामने आया है। नगर निगम की 30 करोड़ की सरकारी जमीन राजस्व रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा कर निजी लोगों के नाम कर दी गई। 0.9480 हेक्टेयर जमीन का मालिकाना हक प्राइवेट लोगों के नाम पर कराने के लिए राजस्व रिकॉर्ड में आवेदन तो किया गया, लेकिन बिना नाम और पता दर्ज किए। शिकायत पर मामले की प्रारंभिक पड़ताल कराई गई तो पता चला कि पूर्व में यह जमीन नगर निगम के नाम नवीन परती के रूप में दर्ज थी। डीएम ने इस मामले में तीन अधिकारियों की कमेटी गठित कर जांच के आदेश दिए हैं। इस मामले में कई पूर्व अधिकारी, कर्मचारी भी फंस सकते हैं।
मामला घूकना गांव के छह खसरा नंबरों 377, 379 380, 381, 402 और 241 की जमीन का है। इन खसरा नंबरों की करीब साढे़ 9 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन राजस्व रिकॉर्ड में नगर निगम की नवीन परती संपत्ति के रूप में दर्ज थी। बाद में इन खसरा नंबरों की जमीन को नवीन, फकीरा, रविंद्र, अमित और दिनेश के नाम दर्ज कर दिया गया। नगर निगम की इस साढ़े 9 हजार वर्ग मीटर जमीन नंदग्राम रेत मंडी के पास स्थित है और इसकी कीमत 30 करोड़ से ज्यादा की बताई जा रही है। शिकायत मिलने पर राजस्व रिकॉर्ड में किए गए इस नाम परिवर्तन की हकीकत को जानने के लिए फसली वर्ष 1420 और 1425 की खतौनी की पड़ताल की गई तो पता चला कि उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश अधिनियम के तहत वाद स्वीकार किया गया और जमीन का नामांतरण करने के आदेश दिए गए हैं, लेकिन इस रिकॉर्ड में न तो वाद संख्या दर्ज की गई है और न ही आवेदकों के नाम दर्ज हैं। यानी फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन करा लिया गया।
नाम बदलवाकर बेच दी जमीन
प्रारंभिक जांच में पता चला है कि फर्जीवाड़ा करके राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन कराने वाले लोगों ने खसरा संख्या-402 की जमीन के बड़े हिस्से को बेच दिया है। इसका बैनामा किया गया है, जबकि उन्हें बैनामा करने का अधिकार ही नहीं था। प्रारंभिक जांच में पाया गया है कि जमीन के इस फर्जीवाड़े को सुनियोजित तरीके से अंजाम देकर सरकारी जमीन को हड़प लिया गया है।
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तीन अधिकारियों की कमेटी करेगी जांच
डीएम राकेश कुमार सिंह ने इस मामले की जांच के लिए तीन अधिकारियों की कमेटी गठित की है। इनमें अपर नगरायुक्त व नगर निगम के संपत्ति प्रभारी अरुण कुमार यादव, एसडीएम सदर विनय कुमार सिंह और उपनिबंधक सुरेश मौर्य शामिल हैं। यह अधिकारी जांच करेंगे कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन कैसे और कब कराया गया है। इसमें सरकारी कर्मचारी या अधिकारियों की भूमिका क्या रही है। डीएम ने कमेटी को सात दिन में जांच पूरी कर नगरायुक्त के माध्यम से रिपोर्ट भेजने के आदेश दिए हैं।
रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई
मामले की शिकायत मिली थी। पुराने रिकॉर्ड की जांच कराई गई तो इसमें प्रारंभिक तथ्य सामने आए हैं। इसमें फर्जीवाड़ा पाया गया है। अब इस प्रकरण की विस्तृत जांच कराई जा रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी। - राकेश कुमार सिंह, डीएम
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गाजियाबाद। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन के घोटाले के बाद अब एक और घोटाला सामने आया है। नगर निगम की 30 करोड़ की सरकारी जमीन राजस्व रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा कर निजी लोगों के नाम कर दी गई। 0.9480 हेक्टेयर जमीन का मालिकाना हक प्राइवेट लोगों के नाम पर कराने के लिए राजस्व रिकॉर्ड में आवेदन तो किया गया, लेकिन बिना नाम और पता दर्ज किए। शिकायत पर मामले की प्रारंभिक पड़ताल कराई गई तो पता चला कि पूर्व में यह जमीन नगर निगम के नाम नवीन परती के रूप में दर्ज थी। डीएम ने इस मामले में तीन अधिकारियों की कमेटी गठित कर जांच के आदेश दिए हैं। इस मामले में कई पूर्व अधिकारी, कर्मचारी भी फंस सकते हैं।
मामला घूकना गांव के छह खसरा नंबरों 377, 379 380, 381, 402 और 241 की जमीन का है। इन खसरा नंबरों की करीब साढे़ 9 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन राजस्व रिकॉर्ड में नगर निगम की नवीन परती संपत्ति के रूप में दर्ज थी। बाद में इन खसरा नंबरों की जमीन को नवीन, फकीरा, रविंद्र, अमित और दिनेश के नाम दर्ज कर दिया गया। नगर निगम की इस साढ़े 9 हजार वर्ग मीटर जमीन नंदग्राम रेत मंडी के पास स्थित है और इसकी कीमत 30 करोड़ से ज्यादा की बताई जा रही है। शिकायत मिलने पर राजस्व रिकॉर्ड में किए गए इस नाम परिवर्तन की हकीकत को जानने के लिए फसली वर्ष 1420 और 1425 की खतौनी की पड़ताल की गई तो पता चला कि उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश अधिनियम के तहत वाद स्वीकार किया गया और जमीन का नामांतरण करने के आदेश दिए गए हैं, लेकिन इस रिकॉर्ड में न तो वाद संख्या दर्ज की गई है और न ही आवेदकों के नाम दर्ज हैं। यानी फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन करा लिया गया।
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नाम बदलवाकर बेच दी जमीन
प्रारंभिक जांच में पता चला है कि फर्जीवाड़ा करके राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन कराने वाले लोगों ने खसरा संख्या-402 की जमीन के बड़े हिस्से को बेच दिया है। इसका बैनामा किया गया है, जबकि उन्हें बैनामा करने का अधिकार ही नहीं था। प्रारंभिक जांच में पाया गया है कि जमीन के इस फर्जीवाड़े को सुनियोजित तरीके से अंजाम देकर सरकारी जमीन को हड़प लिया गया है।
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तीन अधिकारियों की कमेटी करेगी जांच
डीएम राकेश कुमार सिंह ने इस मामले की जांच के लिए तीन अधिकारियों की कमेटी गठित की है। इनमें अपर नगरायुक्त व नगर निगम के संपत्ति प्रभारी अरुण कुमार यादव, एसडीएम सदर विनय कुमार सिंह और उपनिबंधक सुरेश मौर्य शामिल हैं। यह अधिकारी जांच करेंगे कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन कैसे और कब कराया गया है। इसमें सरकारी कर्मचारी या अधिकारियों की भूमिका क्या रही है। डीएम ने कमेटी को सात दिन में जांच पूरी कर नगरायुक्त के माध्यम से रिपोर्ट भेजने के आदेश दिए हैं।
रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई
मामले की शिकायत मिली थी। पुराने रिकॉर्ड की जांच कराई गई तो इसमें प्रारंभिक तथ्य सामने आए हैं। इसमें फर्जीवाड़ा पाया गया है। अब इस प्रकरण की विस्तृत जांच कराई जा रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी। - राकेश कुमार सिंह, डीएम