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Ghaziabad News: रसोई से कारोबार तक, महिलाएं घर से गढ़ रहीं पहचान
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- आचार, पापड़ से लेकर टिफिन तक का कारोबार, सोशल मीडिया से मिल रहे ऑर्डर
शुभांगी गर्ग
गाजियाबाद। घर की रसोई अब केवल खाना बनाने की जगह नहीं रही। महिलाएं यहीं से अपना छोटा कारोबार शुरू कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। आचार, पापड़, टिफिन जैसी सेवाओं से न सिर्फ आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि अपनी अलग पहचान भी बना रही हैं।
क्लाउड किचन चला रही सिम्मी बताती हैं कि चार साल पहले बच्चों के प्रोत्साहन पर यह काम शुरू किया था। देसी घी में खुद हाथ से खाना बनाकर टिफिन तैयार करती हैं। शुरुआत में दो-तीन ऑर्डर ही मिलते थे, अब रोजाना 20 टिफिन बुक रहते हैं। पहले रिश्तेदारों से ऑर्डर आते थे, स्वाद और गुणवत्ता से धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ते गए। अपनी पहचान बढ़ाने के लिए उन्होंने व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम का सहारा लिया। त्योहार और शादी सीजन में बिक्री कई गुना बढ़ जाती है। घर से काम कर आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
इसी तरह सिहानी गेट की हेमा 20 साल से अधिक समय से घर की रसोई से आचार-पापड़ का कारोबार कर रही हैं। आर्थिक तंगी के चलते शुरू किया था, आज उनका बनाया सामान बेंगलुरु और अमेरिका तक बिक रहा है। वह बताती हैं कि 20 साल पहले सोशल मीडिया नहीं था, पहचान और भरोसे से कारोबार आगे बढ़ा। अब ऑर्डर खुद ही आ जाते हैं। रसोई से शुरू हुए ये छोटे प्रयास महिलाओं को आर्थिक मजबूती के साथ सामाजिक पहचान भी दे रहे हैं।
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शुभांगी गर्ग
गाजियाबाद। घर की रसोई अब केवल खाना बनाने की जगह नहीं रही। महिलाएं यहीं से अपना छोटा कारोबार शुरू कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। आचार, पापड़, टिफिन जैसी सेवाओं से न सिर्फ आमदनी बढ़ा रही हैं, बल्कि अपनी अलग पहचान भी बना रही हैं।
क्लाउड किचन चला रही सिम्मी बताती हैं कि चार साल पहले बच्चों के प्रोत्साहन पर यह काम शुरू किया था। देसी घी में खुद हाथ से खाना बनाकर टिफिन तैयार करती हैं। शुरुआत में दो-तीन ऑर्डर ही मिलते थे, अब रोजाना 20 टिफिन बुक रहते हैं। पहले रिश्तेदारों से ऑर्डर आते थे, स्वाद और गुणवत्ता से धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ते गए। अपनी पहचान बढ़ाने के लिए उन्होंने व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम का सहारा लिया। त्योहार और शादी सीजन में बिक्री कई गुना बढ़ जाती है। घर से काम कर आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
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इसी तरह सिहानी गेट की हेमा 20 साल से अधिक समय से घर की रसोई से आचार-पापड़ का कारोबार कर रही हैं। आर्थिक तंगी के चलते शुरू किया था, आज उनका बनाया सामान बेंगलुरु और अमेरिका तक बिक रहा है। वह बताती हैं कि 20 साल पहले सोशल मीडिया नहीं था, पहचान और भरोसे से कारोबार आगे बढ़ा। अब ऑर्डर खुद ही आ जाते हैं। रसोई से शुरू हुए ये छोटे प्रयास महिलाओं को आर्थिक मजबूती के साथ सामाजिक पहचान भी दे रहे हैं।
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